बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Brihadaranyaka Upanishad with Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
DevanagariSanskritpublished1,402 पृष्ठ
पृष्ठ 1160, कुल 1402 में से
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११४६ बृहदारण्यकोपनिषद् [ अध्याय ४
| न हि पारिव्राज्यपक्षे भस्मान्तता शरीरस्य स्यात्। स्मृतिश्च—<br>“निषेकादिश्मशानान्तो मन्त्रैर्यस्योदितो विधिः। तस्य शास्त्रेऽधिकारोऽस्मिञ्ज्ञेयो नान्यस्य कस्यचित्॥” इति। समन्त्रकं हि यत् कर्म वेदेनेह विधीयते तस्य श्मशानान्ततां दर्शयति स्मृतिः। अधिकाराभावप्रदर्शनाच्चात्यन्तमेव श्रुत्यधिकाराभावोऽकर्मिणो गम्यते। अग्न्युद्वासनापवादाच्च “वीरहा वा एष देवानां योऽग्निमुद्वासयते” इति। | होती है। संन्यास-पक्षमें तो शरीर-की भस्मान्तता हो ही नहीं सकती*। इसके सिवा “जिसके गर्भाधानसे लेकर श्मशानपर्यन्त सभी संस्कारोंका विधान मन्त्रों-द्वारा बताया गया है, उसीका इस शास्त्रमें अधिकार समझना चाहिये, किसी दूसरेका नहीं” ऐसी स्मृति भी है। यहाँ वेदने जिस कर्मका मन्त्रपूर्वक विधान किया है, वह कर्म श्मशानपर्यन्त होता है, ऐसा स्मृति प्रदर्शित कर रही है। अधिकारका अभाव प्रदर्शित करने-से तो कर्म न करनेवालेका श्रुतिमें सर्वथा ही अधिकार नहीं है—ऐसा जाना जाता है। इसके सिवा “जो अग्निका उच्छेद करता है, वह देवताओंका वीरहा है” इस प्रकार अग्न्युच्छेदकी निन्दा करनेसे भी यही सिद्ध होता है। |
| [तत्राक्षेपः] ननु व्युत्थानादिविधानाद्वैकल्पिकं क्रियावसानत्वं वेदार्थस्य। | सिद्धान्ती—[किंतु हमारे विचार-में तो] व्युत्थानादिका विधान होनेके कारण वेदार्थका क्रियामें समाप्त होना वैकल्पिक है। |
| [व्युत्थानादिश्रुतीनाम-न्यार्थत्वप्रतिपादनम्] न, अन्यार्थत्वाद् व्युत्थानादिश्रुतीनाम्। “यावज्जीवमग्निहोत्रं जुहोति” “यावज्जीवं दर्शपूर्णमासाभ्यां यजेत”, इत्येवमादीनां | **पूर्व०—**नहीं, क्योंकि व्युत्था-नादि श्रुतियोंका तात्पर्य दूसरा ही है। [उसीको विशद करते हैं—] क्योंकि “जीवनपर्यन्त अग्निहोत्र करे” “जीवन-पर्यन्त दर्श-पूर्णमासद्वारा यजन करे” इत्यादि श्रुतियाँ जीवनमात्र- |
* क्योंकि संन्यासीके शरीरका दाहसंस्कार नहीं होता।