भारतकोश
बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

Brihadaranyaka Upanishad with Shankara Bhashya

आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished1,402 पृष्ठ

पृष्ठ 1161, कुल 1402 में से

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पृष्ठ 1161

ब्राह्मण ५ ] शाङ्करभाष्यार्थ ११४७


संस्कृतहिन्दी अनुवाद
श्रुतीनां जीवनमात्रनिमित्तत्वाद् यदा न शक्यतेऽन्यार्थता कल्पयितुं तदा व्युत्थानादिवाक्यानां कर्मानधिकृतविषयत्वसंभवात् ।निमित्तवाली होनेके कारण, जब कोई अन्य तात्पर्य होनेकी कल्पना ही नहीं की जा सकती, तो व्युत्थानादि वाक्योंका कर्मके अनधिकारियोंके विषयमें होना सम्भव है।
“कुर्वन्नेवेह कर्माणि जिजीविषेच्छतँ समाः” (ईशा० २) इति च मन्त्रवर्णात् “जरया वा ह्येवास्मान्मुच्यते मृत्युना वा” इति च जरामृत्युभ्यामन्यत्र कर्मवियोगच्छिद्रासंभवात् कर्मिणां श्मशानान्तत्वं न वैकल्पिकम् । काणकुब्जादयोऽपि कर्मण्यनधिकृता अनुग्राह्या एव श्रुत्येति व्युत्थानाद्याश्रमान्तरविधानं नानुपपन्नम् ।“कर्म करते हुए ही सो वर्ष जीनेकी इच्छा करे” इस मन्त्रवर्णसे भी यही सिद्ध होता है; तथा “इससे वृद्धावस्थाके कारण मुक्त होता है अथवा मृत्युसे” इस प्रकार जरा और मृत्युके सिवा अन्यत्र कर्मका त्याग अथवा अवकाश सम्भव न होनेसे कर्मियोंका श्मशानान्त होना वैकल्पिक नहीं है। कर्मके अनधिकारी काने और कूबड़े लोगोंपर भी श्रुतिको अनुग्रह करना ही है, इसलिये उनके लिये व्युत्थानादि अन्य आश्रमोंका विधान करना अयुक्त नहीं है।
पारिव्राज्यक्रमविधानस्यानवकाशत्वमिति चेत् ।सिद्धान्ती—तो फिर [ ब्रह्मचर्यसे लेकर ] पारिव्राज्य (संन्यास) तकके आश्रमोंका क्रमविधान निरवकाश¹ होगा !
न; विश्वजित्सर्वमेधयोर्वि-पूर्व०—ऐसी बात नहीं है, क्योंकि विश्वजित् और सर्वमेध यज्ञोंमें जीवन-

१. अर्थात् उस विधिके पालनका अवसर न मिलनेसे श्रुतिमें उसका विधान व्यर्थ होगा।