भारतकोश
बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

Brihadaranyaka Upanishad with Shankara Bhashya

आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished1,402 पृष्ठ

पृष्ठ 1163, कुल 1402 में से

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पृष्ठ 1163
ब्राह्मण ५ ]शाङ्करभाष्यार्थ११४९
संस्कृत-भाष्यहिन्दी-अनुवाद
पासीत' इत्यारभ्य 'स एष नेति नेति' एतदन्तेन ग्रन्थेन यदुपसंहृतमात्मज्ञानं तदमृतत्वसाधनम्—इत्यभ्युपगतं भवता ।यहाँसे लेकर 'स एष नेति नेति' यहाँतकके ग्रन्थसे जिस आत्मज्ञानका उपसंहार किया गया है, वह अमृतत्वका साधन है—ऐसा आपने स्वीकार किया है।
तत्र 'एतावदेवामृतत्वसाधनम्, अन्यनिरपेक्षम्' इत्येतन्न मृष्यते ।पूर्व०—किंतु वहाँ अन्य किसी (कर्म आदि) की अपेक्षासे रहित केवल ज्ञान ही अमृतत्वका साधन है—यह कथन हम नहीं सह सकते !
तत्र भवन्तं पृच्छामि किमर्थमात्मज्ञानं मर्षयति भवानिति ?सिद्धान्ती—तो मैं श्रीमान्‌से पूछता हूँ कि आप आत्मज्ञानको किसलिये सहन करते हैं ?
शृणु तत्र कारणम्—यथा स्वर्गकामस्य स्वर्गप्राप्त्युपायमजानतोऽग्निहोत्रादि स्वर्गप्राप्तिसाधनं ज्ञापयति, तथेहाप्यमृतत्वप्रतिपित्सोरमृतत्वप्राप्त्युपायमजानतः "यदेव भगवान् वेद तदेव मे ब्रूहि" इत्येवमाकाङ्क्षितममृतत्वसाधनम् "एतावदरे" इत्येवमादौ वेदेन ज्ञाप्यत इति ।पूर्व०—इसमें जो कारण है वह सुनिये—जिस प्रकार स्वर्गप्राप्तिका उपाय न जाननेवाले स्वर्गकामी पुरुषको श्रुति अग्निहोत्रादि स्वर्गप्राप्तिके साधन बतलाती है, उसी प्रकार यहाँ भी अमृतत्वप्राप्तिका साधन न जाननेवाले अमृतत्वप्राप्तिके अभिलाषीको वेदके द्वारा "एतावदरे खल्वमृतत्वम्" इत्यादि मन्त्रोंमें "यदेव भगवान् वेद तदेव मे ब्रूहि" इत्यादि प्रकारसे इच्छा किये हुए अमृतत्वके साधनका बोध कराया जाता है।
एवं तर्हि यथा ज्ञापितमग्निहोत्रादि स्वर्गसाधनमभ्युपगम्यतेसिद्धान्ती—इस प्रकार तो, जैसे श्रुतिके द्वारा ज्ञात कराये हुए अग्निहोत्रादि स्वर्गके साधन माने जाते हैं,
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