बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Brihadaranyaka Upanishad with Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 1165, कुल 1402 में से
संदर्भ में पढ़ें| ब्राह्मण ५ ] | शाङ्करभाष्यार्थे | ११५१ |
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| वेद” (४।५।७) “मृत्योः स मृत्युमाप्नोति य इह नानेव पश्यति” (४।४।१९) “एकधैवानुद्रष्टव्यम्” (४।४।२०) “सर्वमात्मानं पश्यति” (४।४।२३) इत्यादिश्रुतिभ्यः। | “जो यहाँ नाना देखता है, वह मृत्युसे मृत्युको प्राप्त होता है”, “निरन्तर एकरूप ही देखना चाहिये”, “सबको आत्मरूप देखता है” इत्यादि श्रुतियोंसे सिद्ध होता है। | | न च देशकालनिमित्ताद्यपेक्षत्वम् व्यवस्थितात्मवस्तुविषयत्वादात्मज्ञानस्य। क्रियायास्तु पुरुषतन्त्रत्वात् स्याद् देशकालनिमित्ताद्यपेक्षत्वम्। ज्ञानं तु वस्तुतन्त्रत्वान्न देशकालनिमित्ताद्यपेक्षते। यथाग्निरुष्ण आकाशोऽमूर्त इति तथात्मविज्ञानमपि। | आत्मज्ञानका विषय कूटस्थ-नित्य आत्म-वस्तु है, इसलिये उसे देश, काल एवं निमित्त आदिकी अपेक्षा नहीं है। कर्म तो पुरुषके अधीन है, इसलिये उसे देश, काल एवं निमित्तादिकी अपेक्षा है। किंतु ज्ञान वस्तुतन्त्र होनेके कारण देश, काल, निमित्त आदिकी अपेक्षा नहीं रखता। जिस प्रकार अग्नि उष्ण है और आकाश अमूर्त है—इन ज्ञानोंको देशादिकी अपेक्षा नहीं है, उसी प्रकार आत्मज्ञानको भी नहीं है। | | नन्वेवं सति प्रमाणभूतस्य कर्मविधेर्निरोधः स्यात्। न च तुल्यप्रमाणयोरितरेतरनिरोधो युक्तः। | पूर्व०—किंतु ऐसा माननेपर तो प्रमाणभूत कर्मविधिका बाध हो जायगा और समान प्रमाणोंमेंसे एक-दूसरेका बाध होना उचित नहीं है। | | न, स्वाभाविकभेदबुद्धिमात्रनिरोधकत्वात्, न हि विध्यन्तरनिरोधकमात्मज्ञानं स्वाभाविकभेदबुद्धिमात्रं निरुणद्धि। | सिद्धान्ती—ऐसी बात नहीं है, क्योंकि आत्मज्ञान तो स्वाभाविक भेदबुद्धिमात्रका बाधक है, वह अन्य विधिका बाधक नहीं है, वह तो केवल स्वाभाविक भेदबुद्धिका ही बाध करता है। |