बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Brihadaranyaka Upanishad with Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
DevanagariSanskritpublished1,402 पृष्ठ
पृष्ठ 1167, कुल 1402 में से
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ब्राह्मण ५ ] शाङ्करभाष्यार्थ ११५३
| संस्कृत मूल | हिन्दी भाष्यार्थ |
|---|---|
| चेत् । अननुष्ठेयत्वेऽनुष्ठातुर-<br>भावादनुष्ठानविध्यानर्थक्यादप्रा-<br>माण्यमेव कर्मविधीनामिति<br>चेत् । | अनुष्ठान करनेके योग्य नहीं है, ऐसा सिद्ध होनेपर अनुष्ठानकर्ताका अभाव हो जानेसे जब अनुष्ठान-विधिकी सार्थकता ही नहीं रही तो कर्मविधियोंकी अप्रामाणिकता ही होगी—ऐसा यदि कहें तो ? |
| न प्रागात्मज्ञानात् प्रवृत्त्युप-<br>पत्तेः। स्वाभाविकस्य क्रियाकारक-<br>फलभेदविज्ञानस्य प्रागात्म-<br>ज्ञानात् कर्महेतुत्वमुपपद्यत एव,<br>यथा कामविषये दोषविज्ञानोत्प-<br>त्तेः प्राक् काम्यकर्मप्रवृत्तिहेतुत्वं<br>स्यादेव स्वर्गादीच्छायाः स्वा-<br>भाविक्यास्तद्वत् । | सिद्धान्ती— यह ठीक नहीं; क्योंकि आत्मज्ञानसे पूर्व कर्ममें प्रवृत्ति हो सकती है। स्वाभाविक क्रिया, कारक और फलरूप भेद-ज्ञानका आत्मज्ञानसे पूर्व कर्ममें हेतु होना सम्भव है ही; जिस प्रकार कि कामनाके विषयमें दोष-बुद्धि होनेसे पूर्व स्वर्ग आदिकी स्वाभाविक इच्छा ही काम्यकर्मोंमें सकाम मनुष्यकी प्रवृत्ति करानेमें कारण हो ही सकती है, वैसे ही यहां समझना चाहिये। |
| तथा सत्यनर्थार्थो वेद इति<br>चेत् । | पूर्व०— ऐसा माननेपर तो वेद अनर्थका हेतु है—यह सिद्ध होगा। |
| न, अर्थानर्थयोरभिप्रायतन्त्र-<br>त्वात् । मोक्षमेकं वर्जयित्वान्य-<br>स्याविद्याविषयत्वात्। पुरुषाभिप्राय-<br>तन्त्रौ ह्यर्थानर्थौ, मरणादिकाम्ये- | सिद्धान्ती— नहीं; क्योंकि अर्थ और अनर्थ तो उद्देश्यके अधीन हैं। एकमात्र मोक्षको छोड़कर और सब अविद्याके ही विषय हैं। इसलिये अर्थ और अनर्थ तो पुरुषके अभिप्रायके ही अधीन हैं, कारण [महाभारतादिमें महाप्रस्थान-रूप] मरण आदिकी इच्छासे भी इष्टियों (यज्ञों) का विधान |
बृ० उ० ७३—