भारतकोश
बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

Brihadaranyaka Upanishad with Shankara Bhashya

आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished1,402 पृष्ठ

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पृष्ठ 117
ब्राह्मण ३ ]शाङ्करभाष्यार्थ१११

शाङ्करभाष्यभाष्यार्थ
त्रात्मना अत्येष्यन्त्यतिगमिष्यन्ति। इत्येवं विज्ञाय तमूद्गातारमभिद्रुत्याभिगम्य स्वेन आसङ्गलक्षणेन पाप्मनाविध्यंस्ताडितवन्तः संयोजितवन्त इत्यर्थः।<br><br>स यः स पाप्मा प्रजापतेः पूर्वजन्मावस्थस्य वाचि क्षिप्तः स एष प्रत्यक्षीक्रियते। कोऽसौ ? यदेवेदमप्रतिरूपमननुरूपं शास्त्रप्रतिषिद्धं वदति येन प्रयुक्तोऽसभ्यबीभत्सानृताद्यनिच्छन्नपि वदति। अनेन कार्येणाप्रतिरूपवदनेन अनुगम्यमानः प्रजापतेः कार्यभूतासु प्रजासु वाचि वर्तते। स एवाप्रतिरूपवदनेनानुमितः स प्रजापतेर्वाचि गतः पाप्मा, कारणानुविधायि हि कार्यमिति ॥ २ ॥अतिगमन—उल्लङ्घन करेंगे। इस प्रकार जानकर उस उद्गाताके पास जाकर उन्होंने अपने अभिनिवेशरूप पापसे उसे विद्ध—ताड़ित अर्थात् संयुक्त कर दिया।<br><br>वह जो पाप पूर्वजन्मावस्थित प्रजापतिकी वाणीमें डाला गया था वही यह प्रत्यक्ष किया जाता है। वह कौन-सा है? यह जो अप्रतिरूप—अननुरूप यानी शास्त्रसे प्रतिषिद्ध भाषण करती है। जिससे प्रेरित होकर ही यह इच्छा न होनेपर भी असभ्यतापूर्ण, बीभत्स और अनृतादि भाषण करती है। इस अननुरूप भाषणरूप कार्यसे अनुगत होता हुआ वह पाप प्रजापतिकी कार्यभूता प्रजाओंकी वाणीमें विद्यमान है। प्रजापतिकी वाणीमें पहुँचा हुआ वही पाप अननुरूप भाषणसे अनुमित होता है, क्योंकि कार्य तो कारणका अनुवर्त्तन करनेवाला होता है ॥ २ ॥

प्राण, चक्षु, श्रोत्र और मनका उद्गान तथा उनका पापविद्ध होना

अथ ह प्राणमूचुस्त्वं न उद्गायेति। तथेति तेभ्यः प्राण उदगायद्यः प्राणे भोगस्तं देवेभ्य आगायद्यत्कल्याणं