भारतकोश
बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

Brihadaranyaka Upanishad with Shankara Bhashya

आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished1,402 पृष्ठ

पृष्ठ 1171, कुल 1402 में से

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पृष्ठ 1171
ब्राह्मण ५ ]शाङ्करभाष्यार्थे११५७

| जीवननिमित्तमेव कर्तव्यं कर्म, प्रायेण हि पुरुषाः कामबहुलाः, कामश्चानेकविषयोऽनेककर्मसाधनसाध्यश्च, अनेकफलसाधनानि च वैदिकानि कर्माणि दाराग्निसम्बन्धपुरुषकर्तव्यानि पुनः पुनश्चानुष्ठीयमानानि बहुफलानि कृष्यादिवद् वर्षशतसमाप्तीनि च गार्हस्थ्ये वारण्ये वा, अतस्तदपेक्षया 'यावज्जीव' श्रुतयः, “कुर्वन्नेवेह कर्माणि” इति च मन्त्रवर्णः । तस्मिंश्च पक्षे विश्वजित्सर्वमेधयोः कर्मपरित्यागः । यस्मिंश्च पक्षे यावज्जीवानुष्ठानं तदा श्मशानान्तत्वं भस्मान्तता च शरीरस्य ।<br><br>इतरवर्णापेक्षया वा यावज्जीवश्रुतिः । न हि क्षत्रियवैश्ययोः पारिव्राज्यप्रतिपत्तिरस्ति । तथा “मन्त्रैर्यस्योदितो विधिः” “एकाश्रम्यं त्वाचार्याः” इत्येवमादीनां | ही केवल जीवनके निमित्त ही कर्म कर्तव्य नहीं है, प्रायः लोग अधिक कामनाएं रखनेवाले होते हैं, कामनाके विषय भी बहुत-से हैं और वे अनेकों कर्म एवं साधनोंसे साध्य हैं; वैदिक कर्म भी अनेक फलोंके साधन हैं और वे स्त्री और अग्निसे सम्बन्ध रखनेवाले पुरुषके ही कर्तव्य हैं, बारंबार अनुष्ठान किये जानेपर वे कृषि आदिके समान बहुत-से फल देनेवाले हैं तथा गार्हस्थ्य अथवा वानप्रस्थ आश्रममें सौ वर्षोंमें समाप्त होनेवाले हैं; अतः उनकी अपेक्षासे आजीवन अग्निहोत्रका विधान करनेवाली श्रुतियां और “कुर्वन्नेवेह कर्माणि” यह मन्त्रवर्ण है । उसी पक्षमें विश्वजित् और सर्वमेधमें कर्मका परित्याग भी है और जिस पक्षमें कर्मका जीवनभर अनुष्ठान विहित है, वहीं शरीरका अन्त श्मशान और भस्मके रूपमें होता है ।<br><br>अथवा आजीवन कर्मका विधान करनेवाली श्रुति ब्राह्मणेतर वर्णोंकी अपेक्षासे भी हो सकती है; क्योंकि क्षत्रिय और वैश्यके लिये संन्यासकी प्राप्ति नहीं है तथा “जिसकी विधि मन्त्रोंद्वारा बतलायी गयी है” “आचार्योंने इनको एकाश्रमी बतलाया है” |