भारतकोश
बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

Brihadaranyaka Upanishad with Shankara Bhashya

आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished1,402 पृष्ठ

पृष्ठ 1182, कुल 1402 में से

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पृष्ठ 1182
११६८बृहदारण्यकोपनिषद्[ अध्याय ५

| तथा वस्तुविषय इहाद्वैतं ब्रह्मोत्सङ्गेन प्रतिपाद्य पुनस्तदेकदेशेऽपवदितुं शक्यते, ब्रह्मणोऽद्वैतत्वादेवैकदेशानुपपत्तेः । | वैसा उस प्रकार वस्तुके विषयमें यहाँ सामान्यतः अद्वैत ब्रह्मका प्रतिपादन कर फिर उसके किसी एक देशमें ब्रह्मका अपवाद (बाध) नहीं किया जा सकता; क्योंकि अद्वैत होनेके कारण ब्रह्मका कोई एक देश नहीं हो सकता । | | तथा विकल्पानुपपत्तेश्च । यथा 'अतिरात्रे षोडशिनं गृह्णाति' 'नातिरात्रे षोडशिनं गृह्णाति' इति ग्रहणाग्रहणयोः पुरुषाधीनत्वाद् विकल्पो भवति; न त्विह तथा वस्तुविषये 'द्वैतं वा स्यादद्वैतं वा' इति विकल्पः सम्भवति, अपुरुषतन्त्रत्वादात्मवस्तुनः; विरोधाच्च द्वैताद्वैतत्वयोरेकस्य । तस्मान्न सुविवक्षितेयं कल्पना । | इसी प्रकार विकल्प न हो सकनेके कारण भी ऐसा होना असम्भव है । जिस प्रकार 'अतिरात्रयागमें षोडशीका ग्रहण करे' 'अतिरात्रयागमें षोडशीका ग्रहण नहीं करे' इस प्रकार ग्रहण और अग्रहण पुरुषके अधीन होनेके कारण उनमें विकल्प¹ हो सकता है, उस प्रकार यहाँ वस्तुके विषयमें 'वह द्वैत हो अथवा अद्वैत हो' ऐसा विकल्प¹ नहीं हो सकता, क्योंकि आत्मतत्त्व पुरुषके अधीन नहीं है । इसके सिवा एक ही वस्तुका द्वैताद्वैतरूप होना विरुद्ध भी है । इसलिये यह कल्पना सुविवक्षित नहीं है । | | श्रुतिन्यायविरोधाच्च — सैन्धवघनवत् प्रज्ञानैकरसघनं निरन्तरं | श्रुति और युक्तिसे विरुद्ध होनेके कारण भी ऐसा कहना ठीक नहीं है । 'सैन्धवघनके समान प्रज्ञानैक- |


जाता । भिक्षाटनमें किसीकी हिंसा नहीं की जाती; अनजानमें पैरसे दबकर किसी जीवको कष्ट पहुँचनेकी सम्भावनामात्र रहती है ।
१. विकल्प इस प्रकार है; 'क्वचिद् अतिरात्रे षोडशिनं गृह्णाति क्वचिद् न गृह्णाति' अर्थात् 'कहीं अतिरात्रमें षोडशीका ग्रहण करे और कहीं न करे ।'