बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Brihadaranyaka Upanishad with Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 1181, कुल 1402 में से
संदर्भ में पढ़ेंब्राह्मण १] शाङ्करभाष्यार्थ ११६७
| संस्कृत-मूल | हिन्दी-अनुवाद |
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| र्थथा श्रुत्यैतदुक्तं कार्यकारणयोः सत्यत्वं समुद्रवत् 'पूर्णमदः' इत्यादिनेति । | परिहार करनेकी इच्छासे ही 'पूर्णमदः' इत्यादि मन्त्रद्वारा श्रुतिने समुद्रके समान यह कार्य-कारणकी सत्यता बतलायी है। |
| तदसत्, विशिष्टविषयापवादविकल्पयोरसम्भवात् । न हीयं सुविवक्षिता कल्पना, कस्मात् ? यथा क्रियाविषय उत्सर्गप्राप्तस्यैकदेशेऽपवादः क्रियते, यथा "अहिंसन् सर्वभूतान्यन्यत्र तीर्थेभ्यः" (छा० उ० ८।१५।१) इति हिंसा सर्वभूतविषयोत्सर्गेण निवारिता, तीर्थे विशिष्टविषये ज्योतिष्टोमादावनुज्ञायते; न च | सिद्धान्ती—ऐसा कहना ठीक नहीं, क्योंकि [निर्विरोध ब्रह्ममें] विशिष्टके विषयभूत अपवाद और विकल्प सम्भव नहीं हैं। [आपकी] यह कल्पना सुविवक्षित (युक्तियुक्त) नहीं है ! क्यों ?—जिस प्रकार क्रियाके विषयमें उत्सर्गसे (सामान्यतः) प्राप्त किसी क्रियाका किसी एक देशमें [विशेष वचनद्वारा] अपवाद कर दिया जाता है; जैसे "तीर्थों (पुण्यकर्मों) को छोड़कर अन्यत्र सभी प्राणियोंकी हिंसा न करता हुआ" इस वाक्यमें जिस सब प्राणियोंकी हिंसाका सामान्यतः निवारण किया है, उसकी तीर्थ यानी विशिष्ट विषय—ज्योतिष्टोमादि यज्ञोंमें अनुज्ञा दी जाती है । |
* वास्तवमें इस श्रुतिके द्वारा कहीं भी हिंसाका विधान नहीं प्राप्त होता है। इसके द्वारा तो सर्वत्र अहिंसाका ही आदेश किया गया है। छान्दोग्य-उपनिषद्में श्रीशंकराचार्यने 'अन्यत्र तीर्थेभ्यः' की व्याख्या इस प्रकार की है—'भिक्षानिमित्तमटनादिनापि परपीडा स्यादित्यत आह--अन्यत्र तीर्थेभ्यः। तीर्थं नाम शास्त्रानुज्ञाविषयस्ततोऽन्यत्रेत्यर्थः।' इसका भाव इस प्रकार है--भिक्षाके लिये घूमने आदिसे भी तो दूसरोंको पीड़ा पहुँच सकती है, इसके निवारणके लिये कहा—अन्यत्र तीर्थेभ्यः। जो शास्त्राज्ञाका विषय है अर्थात् जिसके लिये शास्त्रकी आज्ञा है, उस कर्मको करते हुए यदि किसीको अनायास कष्ट पहुँच जाय तो उसके लिये कोई दोष नहीं होता; यदि ऐसी बात नहीं होती तो भिक्षाटनका दृष्टान्त नहीं दिया