बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Brihadaranyaka Upanishad with Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 1180, कुल 1402 में से
संदर्भ में पढ़ें| ११६६ | बृहदारण्यकोपनिषद् | [अध्याय ५ | | :--- | :--- |
| कालेषु कार्यकारणयोः पूर्णतैव । सा चैकैव पूर्णता कार्यकारणयोर्भेदेन व्यपदिश्यते । एवं च द्वैताद्वैतात्मकमेकं ब्रह्म । | कार्य-कारणकी पूर्णता ही है। यह एक पूर्णता ही कार्य-कारणके भेदसे कही जाती है। इस प्रकार द्वैताद्वैतरूप एक ही ब्रह्म है। | | यथा किल समुद्रो जलतरङ्गफेनबुद्बुदाद्यात्मक एव । यथा च जलं सत्यं तदुद्भवाश्च तरङ्गफेनबुद्बुदायः समुद्रात्मभूता एवाविर्भावतिरोभावधर्मिणः परमार्थसत्या एव । एवं सर्वमिदं द्वैतं परमार्थसत्यमेव जलतरङ्गादिस्थानीयम्, समुद्रजलस्थानीयं तु परं ब्रह्म । | जिस प्रकार समुद्र जल-तरङ्ग-फेन-बुद्बुदादिरूप ही है और उसमें जैसे जल सत्य है, उसी प्रकार उससे होनेवाले आविर्भाव-तिरोभाव-धर्मी तरङ्ग, फेन एवं बुद्बुदादि भी समुद्ररूप और परमार्थ सत्य ही हैं। इस प्रकार यह जलतरङ्गादिस्थानीय सारा द्वैत परमार्थ सत्य ही है और परब्रह्म तो समुद्रके जलस्थानीय ही है। | | एवं च किल द्वैतस्य सत्यत्वे कर्मकाण्डस्य प्रामाण्यम्, यदा पुनर्द्वैतं द्वैतमिवविद्याकृतं मृगतृष्णिकावदनृतम्, अद्वैतमेव परमार्थतः, तदा किल कर्मकाण्डं विषयाभावादप्रमाणं भवति । तथा च विरोध एव स्यात्— वेदैकदेशभूतोपनिषत् प्रमाणम्, परमार्थाद्वैतवस्तुप्रतिपादकत्वात्; अप्रमाणं कर्मकाण्डम्, असद्द्वैतविषयत्वात् । तद्विरोधपरिजिही- | इस प्रकार द्वैतके सत्य होनेपर ही कर्मकाण्डकी प्रामाणिकता हो सकती है। जब द्वैत केवल द्वैत-सा तथा अविद्याकृत और मृगतृष्णाके समान मिथ्या है, परमार्थतः अद्वैत ही सत्य है-ऐसा कहते हैं तब तो अपने विषयका अभाव हो जानेके कारण कर्मकाण्ड अप्रामाणिक ही हो जाता है और ऐसा माननेपर परमार्थ अद्वैत वस्तुका प्रतिपादन करनेवाली होनेके कारण वेदकी एकदेशभूत उपनिषदें तो प्रामाणिक हैं; किंतु असत् द्वैतविषयक होनेसे कर्मकाण्ड अप्रामाणिक है—यह विरोध अनिवार्य होगा, अतः उस विरोधका |