भारतकोश
बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

Brihadaranyaka Upanishad with Shankara Bhashya

आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished1,402 पृष्ठ

पृष्ठ 1179, कुल 1402 में से

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पृष्ठ 1179

ब्राह्मण १ ] शाङ्करभाष्यार्थे ११६५


| ब्रह्मास्मि’ इत्येवं पूर्णमादाय तिरस्कृत्यापूर्णस्वरूपतामविद्याकृतां नामरूपोपाधिसम्पर्कजामेतया ब्रह्मविद्यया पूर्णमेव केवलमवशिष्यते । तथा चोक्तम्— ‘तस्मात्तत्सर्वमभवत्’ (१।४।१०) इति ।<br><br>यः सर्वोपनिषदर्थो ब्रह्म स एषोऽनेन मन्त्रेणानूद्यत उत्तरसम्बन्धार्थम् । ब्रह्मविद्यासाधनत्वेन हि वक्ष्यमाणानि साधनान्योङ्कारदमदानदयाख्यानि विधित्सितानि खिलप्रकरणसम्बन्धात् सर्वोपासनाङ्गभूतानि च ।<br><br>अत्रैके वर्णयन्ति पूर्णात् कारणात् पूर्णं कार्यमुद्रिच्यते । उद्रिक्तं कार्यं वर्तमानकालेऽपि पूर्णमेव परमार्थवस्तुभूतं द्वैतरूपेण । पुनः प्रलयकाले पूर्णस्य कार्यस्य पूर्णतामादायात्मनि धित्वा पूर्णमेवावशिष्यते कारणरूपम् । एवमुत्पत्तिस्थितिप्रलयेषु त्रिष्वपि<br>(द्वैताद्वैतवादिमत-प्रदर्शनम्) | इस प्रकार पूर्णत्वको लेकर इस ब्रह्मविद्याके द्वारा अविद्याकृत नामरूपाधिके संसर्गसे उत्पन्न हुई अपूर्णरूपताका तिरस्कार कर दिया जाता है तो केवल पूर्ण हो रह जाता है । यही बात ‘तस्मात्तत्सर्वमभवत्’ इस वाक्यके द्वारा कही गयी है ।<br><br>जो सारे उपनिषद्का अर्थभूत [ब्रह्म] है, उसीका आगेके ग्रन्थसे सम्बन्ध प्रदर्शित करनेके लिये इस मन्त्रके द्वारा अनुवाद किया जाता है तथा जो खिलप्रकरणके सम्बन्धसे सारी उपासनाओंके अङ्गभूत हैं, उन ओङ्कार, दम, दान और दयासंज्ञक साधनोंका भी यहाँ ब्रह्मविद्याके साधनरूपसे विधान करना अभीष्ट है ।<br><br>यहाँ एक पक्षवाले (द्वैताद्वैतवादी ) विद्वान् ऐसा वर्णन करते हैं कि पूर्ण कारणसे पूर्ण कार्य उत्पन्न होता है । वह उत्पन्न हुआ कार्य वर्तमान समयमें भी पूर्ण ही है, अर्थात् द्वैतरूपसे परमार्थ वस्तुभूत ही है । फिर प्रलयकालमें पूर्ण कार्यकी पूर्णताको लेकर उसका आत्मामें ही आधान करनेपर कारणरूप पूर्ण ही रह जाता है । इस प्रकार उत्पत्ति, स्थिति और प्रलय—तीनों ही कालोंमें |