बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Brihadaranyaka Upanishad with Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
DevanagariSanskritpublished1,402 पृष्ठ
पृष्ठ 1184, कुल 1402 में से
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| ११७० | बृहदारण्यकोपनिषद् | [अध्याय ५ |
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| संस्कृत-भाष्यम् | हिन्दी-अनुवाद |
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| न, अन्यविषयत्वात्। नित्यनिरवयववस्तुविषयं हि विरुद्धत्वमवोचाम द्वैताद्वैतत्वस्य, न कार्यविषये सावयवे। तस्माच्छ्रुतिस्मृतिन्यायविरोधादनुपपन्नेयं कल्पना; अस्याः कल्पनाया वरमुपनिषत्परित्याग एव। | सिद्धान्ती-ऐसी बात नहीं है, क्योंकि [ हम जो विरोध दिखलाते हैं ] उसका विषय दूसरा है। हमने नित्य और निरवयव वस्तुके विषयमें द्वैताद्वैतका विरोध बतलाया है, सावयव कार्यके विषयमें नहीं। अतः श्रुति-स्मृति और युक्तिसे विरोध होनेके कारण यह कल्पना अनुचित है। इस कल्पनाकी अपेक्षा तो उपनिषद्का परित्याग कर देना ही अच्छा है। |
| अध्येयत्वाच्च न शास्त्रार्थेयं कल्पना। न हि जननमरणायनर्थशतसहस्रभेदसमाकुलं समुद्रवनादिवत् सावयवमनेकरसं ब्रह्म ध्येयत्वेन विज्ञेयत्वेन वा श्रुत्योपदिश्यते। | सावयव ब्रह्मका ध्येयरूपसे उपदेश न होनेके कारण भी यह कल्पना शास्त्रका तात्पर्य नहीं हो सकती। जो जन्म-मरणादि सैकड़ों-सहस्रों अनर्थरूप भेदसे सम्पन्न और समुद्र एवं वनादिके समान सावयव तथा अनेक रस है, ऐसे ब्रह्मका श्रुतिद्वारा ध्येय या ज्ञेयरूपसे उपदेश नहीं किया जाता। |
| प्रज्ञानघनतां चोपदिशति, “एकधैवानुद्रष्टव्यम्” (बृ०उ० ४।४।२०) इति च अनेकधादर्शनापवादाच्च— “मृत्योः स मृत्युमाप्नोति य इह नानेव पश्यति” (४।४।१९) इति। | इसके सिवा श्रुति उसकी प्रज्ञानघनताका भी उपदेश देती है तथा ऐसा भी कहती है कि “उसे निरन्तर एक प्रकार ही देखना चाहिये।” “जो यहाँ नानावत् देखता है वह मृत्युसे मृत्युको प्राप्त होता है”, इस प्रकार अनेकरूप देखनेकी निन्दा की जानेसे भी यही सिद्ध होता है। और |