भारतकोश
बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

Brihadaranyaka Upanishad with Shankara Bhashya

आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished1,402 पृष्ठ

पृष्ठ 1185, कुल 1402 में से

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पृष्ठ 1185

ब्राह्मण १] शाङ्करभाष्यार्थ ११७१


शाङ्करभाष्यभाष्यार्थ
यच्च श्रुत्या निन्दितं तन्न कर्तव्यम्, यच्च न क्रियते न स शास्त्रार्थः ब्रह्मणोऽनेकरसत्वमनेकधात्वं च द्वैतरूपं निन्दितत्वान्न द्रष्टव्यम्; अतो न शास्त्रार्थः। यत्त्वेकरसत्वं ब्रह्मणः, तद् द्रष्टव्यत्वात् प्रशस्तम्, प्रशस्तत्वाच्च शास्त्रार्थो भवितुमर्हति ।जिसकी श्रुतिने निन्दा की हो वह कर्तव्य नहीं हो सकता तथा जो किया नहीं जाता वह शास्त्रका तात्पर्य नहीं हो सकता । ब्रह्मके द्वैतरूप अनेकरसत्व और नानात्वकी निन्दा की गयी, इसलिये उसे ब्रह्ममें नहीं देखना चाहिये, अतएव वह शास्त्रका तात्पर्य नहीं है । ब्रह्मकी जो एकरसता है, वही द्रष्टव्य होनेके कारण प्रशस्त है और प्रशस्त होनेके कारण वह शास्त्रका तात्पर्य भी हो सकती है ।
यत्तूक्तं वेदैकदेशस्याप्रामाण्यं कर्मविषये द्वैताभावादद्वैते च प्रामाण्यमिति तन्न; यथाप्राप्तोपदेशार्थत्वात् । न हि द्वैतमद्वैतं वा वस्तु जातमात्रमेव पुरुषं ज्ञापयित्वा पश्चात् कर्म वा ब्रह्मविद्यां वोपदिशति शास्त्रम् ।और ऐसा जो कहा कि द्वैतका अभाव होनेके कारण वेदके कर्म-विषयक एक भागकी तो अप्रामाणिकता हो जायगी और अद्वैत-विषयमें प्रामाणिकता होगी, सो ऐसी बात भी नहीं है; क्योंकि शास्त्र तो यथाप्राप्त वस्तुका उपदेश करनेके लिये है । जन्म लेते ही किसी पुरुषको द्वैत या अद्वैत-तत्त्वका बोध कराकर फिर उसे कर्म या ब्रह्मविद्याका उपदेश शास्त्र नहीं कर देता ।
न चोपदेशार्हं द्वैतम्; जातमात्रप्राणिबुद्धिगम्यत्वात् । न च द्वैतस्यानृतत्वबुद्धिः प्रथममेवइसके सिवा द्वैत तो उपदेशके योग्य है भी नहीं, क्योंकि वह तो प्रत्येक जन्मधारी जीवकी बुद्धिका विषय है । आरम्भसे ही किसीको द्वैतमें मिथ्यात्वबुद्धि नहीं होती,