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बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

Brihadaranyaka Upanishad with Shankara Bhashya

आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished1,402 पृष्ठ

ब्राह्मण १] शाङ्करभाष्यार्थ ११७१

ब्राह्मण १] शाङ्करभाष्यार्थ ११७१


शाङ्करभाष्यभाष्यार्थ
यच्च श्रुत्या निन्दितं तन्न कर्तव्यम्, यच्च न क्रियते न स शास्त्रार्थः ब्रह्मणोऽनेकरसत्वमनेकधात्वं च द्वैतरूपं निन्दितत्वान्न द्रष्टव्यम्; अतो न शास्त्रार्थः। यत्त्वेकरसत्वं ब्रह्मणः, तद् द्रष्टव्यत्वात् प्रशस्तम्, प्रशस्तत्वाच्च शास्त्रार्थो भवितुमर्हति ।जिसकी श्रुतिने निन्दा की हो वह कर्तव्य नहीं हो सकता तथा जो किया नहीं जाता वह शास्त्रका तात्पर्य नहीं हो सकता । ब्रह्मके द्वैतरूप अनेकरसत्व और नानात्वकी निन्दा की गयी, इसलिये उसे ब्रह्ममें नहीं देखना चाहिये, अतएव वह शास्त्रका तात्पर्य नहीं है । ब्रह्मकी जो एकरसता है, वही द्रष्टव्य होनेके कारण प्रशस्त है और प्रशस्त होनेके कारण वह शास्त्रका तात्पर्य भी हो सकती है ।
यत्तूक्तं वेदैकदेशस्याप्रामाण्यं कर्मविषये द्वैताभावादद्वैते च प्रामाण्यमिति तन्न; यथाप्राप्तोपदेशार्थत्वात् । न हि द्वैतमद्वैतं वा वस्तु जातमात्रमेव पुरुषं ज्ञापयित्वा पश्चात् कर्म वा ब्रह्मविद्यां वोपदिशति शास्त्रम् ।और ऐसा जो कहा कि द्वैतका अभाव होनेके कारण वेदके कर्म-विषयक एक भागकी तो अप्रामाणिकता हो जायगी और अद्वैत-विषयमें प्रामाणिकता होगी, सो ऐसी बात भी नहीं है; क्योंकि शास्त्र तो यथाप्राप्त वस्तुका उपदेश करनेके लिये है । जन्म लेते ही किसी पुरुषको द्वैत या अद्वैत-तत्त्वका बोध कराकर फिर उसे कर्म या ब्रह्मविद्याका उपदेश शास्त्र नहीं कर देता ।
न चोपदेशार्हं द्वैतम्; जातमात्रप्राणिबुद्धिगम्यत्वात् । न च द्वैतस्यानृतत्वबुद्धिः प्रथममेवइसके सिवा द्वैत तो उपदेशके योग्य है भी नहीं, क्योंकि वह तो प्रत्येक जन्मधारी जीवकी बुद्धिका विषय है । आरम्भसे ही किसीको द्वैतमें मिथ्यात्वबुद्धि नहीं होती,

११७२ बृहदारण्यकोपनिषद् [ अध्याय ५

११७२ बृहदारण्यकोपनिषद् [ अध्याय ५


संस्कृतहिन्दी
कस्यचित् स्यात्, येन द्वैतस्य सत्यत्वमुपादिश्य पश्चादात्मनः प्रामाण्यं प्रतिपादयेच्छास्त्रम् । नापि पाषण्डिभिरपि प्रस्थापिताः शास्त्रस्य प्रामाण्यं न गृह्णीयुः ।जिससे कि शास्त्र उसे द्वैतका सत्यत्व समझाकर फिर अपनी प्रामाणिकताका प्रतिपादन करे । तथा [ बौद्धादि ] पाखण्डियोंद्वारा श्रेयोमार्गमें प्रवृत्त किये हुए शिष्य-गण भी शास्त्रका प्रामाण्य स्वीकार न करें-ऐसी बात भी नहीं है ।
तस्माद् यथाप्राप्तमेव द्वैतमविद्याकृतं स्वाभाविकमुपादाय स्वाभाविक्यैवाविद्यया युक्ताय रागद्वेषादिदोषवते यथाभिमतपुरुषार्थसाधनं कर्मोपदिशत्यग्रे पश्चात् प्रसिद्धक्रियाकारकफलस्वरूपदोषदर्शनवते तद्विपरीतौदासीन्यस्वरूपावस्थानफलार्थिने तदुपायभूतामात्मैकत्वदर्शनात्मिकां ब्रह्मविद्यामुपदिशति । अथैवं सति तदौदासीन्यस्वरूपावस्थाने फले प्राप्ते शास्त्रस्य प्रामाण्यं प्रत्यर्थित्वं निवर्तते । तदभावाच्छास्त्रस्यापि शास्त्रत्वं तं प्रति निवर्तत एव ।अतः अविद्याकृत यथाप्राप्त स्वाभाविक द्वैतको ही ग्रहणकर जो स्वाभाविक अविद्यासे युक्त और रागद्वेषवान् है, उस पुरुषको शास्त्र पहले उसके अभिमत कर्मरूप पुरुषार्थके साधनका उपदेश करता है । पीछे जो प्रसिद्ध क्रिया, कारक और फलस्वरूप कर्ममें दोष देखनेवाला तथा उससे विपरीत उदासीनरूपसे स्थितिरूप फलका इच्छुक होता है, उसे ही वह उसकी उपायभूता आत्मैकत्वदर्शनरूपा ब्रह्मविद्याका उपदेश करता है । फिर ऐसा होनेपर उस औदासीन्यस्वरूपमें स्थितिरूप फलकी प्राप्ति हो जानेपर शास्त्रके प्रामाण्यके प्रति आकांक्षाकी निवृत्ति हो जाती है । उसका अभाव हो जानेपर उसके लिये शास्त्रका शास्त्रत्व भी निवृत्त हो ही जाता है ।
तथा प्रतिपुरुषं परिसमाप्तं शास्त्रमिति न शास्त्रविरोधगन्धो-इस प्रकार प्रत्येक पुरुषके प्रति शास्त्रका प्रयोजन पूरा हो जाता है, इसलिये शास्त्रके विरोधकी तो गन्ध

| ब्राह्मण १] | शाङ्करभाष्यार्थे | ११७३ |

ब्राह्मण १]शाङ्करभाष्यार्थे११७३
संस्कृत (भाष्य)हिन्दी (भाष्यार्थ)
ऽप्यस्ति, अद्वैतज्ञानावसानत्वाच्छास्त्रशिष्यशासनादिद्वैतभेदस्य । अन्यतमावस्थाने हि विरोधः स्यादवस्थितस्य, इतरेतरापेक्षत्वात्तु शास्त्रशिष्यशासनानां नान्यतमोऽप्यवतिष्ठते । सर्वसमाप्तौ तु कस्य विरोध आशङ्क्येताद्वैते केवले शिवे सिद्धे ? नाप्यविरोधता अत एव ।भी नहीं है; क्योंकि शास्त्र, शिष्य और शासनादि द्वैतभेदकी तो अद्वैतज्ञान होनेपर समाप्ति हो जाती है। यदि इनमेंसे कोई भी रह जाता तो उस रहे हुएका विरोध रहता। किंतु ये शास्त्र, शिष्य और शासन तो एक-दूसरेकी अपेक्षा रखनेवाले हैं, इसलिये इनमेंसे कोई भी स्थित नहीं रहता इस प्रकार सबकी समाप्ति हो जानेपर तो एकमात्र, शिवस्वरूप, नित्यसिद्ध अद्वैतमें किसके विरोधकी आशङ्का की जाय ? और इसीसे उसका किसीसे अविरोध भी नहीं है।
अथाप्यभ्युपगम्य ब्रूमः— <br> द्वैताद्वैतात्मकत्वेऽपि शास्त्रविरोधस्य तुल्यत्वात् । यदापि समुद्रादिवद् द्वैताद्वैतात्मकमेकं ब्रह्माभ्युपगच्छामो नान्यद् वस्त्वन्तरम्, तदापि भवदुक्ताच्छास्त्रविरोधान्न मुच्यामहे ।अब हम ब्रह्मको द्वैताद्वैतरूप मानकर भी बतलाते हैं कि उसके द्वैताद्वैतरूप होनेपर भी शास्त्रका विरोध ऐसा ही है। जब हम समुद्रादिके समान द्वैताद्वैतरूप एक ही ब्रह्म स्वीकार करते हैं, उसके सिवा कोई दूसरी वस्तु नहीं मानते उस समय भी हम आपके बतलाये हुए शास्त्रविरोधसे मुक्त नहीं होते !
कथम् ? एकं हि परं ब्रह्म द्वैताद्वैतात्मकं तच्छोकमोहाद्यतीतत्वादुपदेशं न काङ्क्षति । नोपदेष्टा अन्यो ब्रह्मणो द्वैता-किस प्रकार ? [सो बतलाते हैं-] <br> द्वैताद्वैतरूप एक ही ब्रह्म है, वह शोकमोहादिसे अतीत होनेके कारण उपदेशकी आकांक्षा नहीं रख सकता । इसके सिवा उपदेश करनेवाला भी

| ११७४ | बृहदारण्यकोपनिषद् | [ अध्याय ५ |

११७४बृहदारण्यकोपनिषद्[ अध्याय ५

| द्वैतरूपस्य ब्रह्मण एकस्यैवाभ्युपगमात् । | ब्रह्मसे भिन्न नहीं हो सकता; क्योंकि द्वैताद्वैतरूप एक ही ब्रह्म स्वीकार किया गया है । | | अथ द्वैतविषयस्यानेकत्वार्दन्योन्योपदेशो न ब्रह्मविषय उपदेश इति चेत् ? तदा द्वैताद्वैतात्मकमेकमेव ब्रह्म नान्यदस्तीति विरुध्यते । यस्मिन् द्वैतविषयेऽन्योन्योपदेशः सोऽन्योऽद्वैतं चान्यदेवेति समुद्रदृष्टान्तो विरुद्धः । न च समुद्रोदकैकत्ववद् विज्ञानैकत्वे ब्रह्मणोऽन्यत्रोपदेशग्रहणादिकल्पना सम्भवति । न हि हस्तादिद्वैताद्वैतात्मके देवदत्ते वाक्कर्णयोर्देवदत्तैकदेशभूतयोर्वागुपदेष्ट्री कर्णः केवल उपदेशस्य ग्रहीता, देवदत्तस्तु नोपदेष्टा नाप्युपदेशस्य ग्रहीतेति कल्पयितुं शक्यते; समुद्रैकोदकात्मत्ववदेकविज्ञानवत्त्वाद् देवदत्तस्य । त- | और यदि ऐसा कहो कि द्वैत विषय अनेकरूप है, इसलिये उसमें परस्पर उपदेश हो सकता है; ब्रह्मरूप विषयमें उपदेश नहीं होता, तब तो द्वैताद्वैतरूप एक ही ब्रह्म है, उससे भिन्न कोई नहीं है—इस कथनसे विरोध होगा । जिस द्वैतविषयमें परस्पर उपदेश होता है, वह तो अन्य होगा और अद्वैत अन्य होगा—इस प्रकार समुद्रका दृष्टान्त विरुद्ध ही रहा । यदि समुद्रके जलकी एकताके समान विज्ञानकी भी एकता है, तो ब्रह्मसे भिन्न उपदेशग्रहणादिकी कल्पना संभव नहीं हो सकती । हस्तपादादि द्वैताद्वैतरूप देवदत्तमें देवदत्तके एकदेशभूत वाणी और कर्णमेंसे केवल वाणी उपदेश करनेवाली है और अकेला कर्ण उपदेशको ग्रहण करनेवाला है, देवदत्त न तो उपदेश देनेवाला है और न उसे ग्रहण करनेवाला—ऐसी कल्पना नहीं की जा सकती; क्योंकि जिस प्रकार समुद्र एकमात्र जलस्वरूप है, उसी प्रकार देवदत्त भी एक ही |

ब्राह्मण १ ] शाङ्करभाष्यार्थ ११७५

ब्राह्मण १ ] शाङ्करभाष्यार्थ ११७५


| स्माच्छ्रुतिन्यायविरोधश्चाभिप्रेता- <br> र्थासिद्धिश्चैवंकल्पनायां स्यात्। <br><br> तस्माद् यथाव्याख्यात एवास्माभिः <br><br> 'पूर्णमदः' इत्यस्य मन्त्रस्यार्थः। | विज्ञानवान् है। अतः ऐसी कल्पना करनेमें श्रुति और युक्तिसे विरोध तथा अभिमत अर्थकी असिद्धि भी होगी। इसलिये 'पूर्णमदः' इत्यादि इस मन्त्रका अर्थ, जैसी हमने व्याख्या की है, वही है। |

ॐ खं ब्रह्म और उसकी उपासनाका वर्णन

ॐ खं ब्रह्म ! * खं पुराणं वायुरं खमिति ह स्माह कौरव्यायणीपुत्रो वेदोऽयं ब्राह्मणा विदुर्वेदैनेन यद् वेदितव्यम् ॥ १ ॥

आकाश ब्रह्म ॐकार है। आकाश [ यहाँ जड नहीं ] सनातन [ परमात्मा ] है। 'जिसमें वायु रहता, वह आकाश ही ख है'—ऐसा कौरव्यायणीपुत्रने कहा है। यह ओङ्कार वेद है—ऐसा ब्राह्मण जानते हैं; क्योंकि जो ज्ञातव्य है, उसका इससे ज्ञान होता है ॥ १ ॥

| ॐ खं ब्रह्मेति मन्त्रोऽयं चान्यत्राविनियुक्त इह ब्राह्मणेन ध्यानकर्मणि विनियुज्यते। अत्र च ब्रह्मेति विशेष्याभिधानं खमिति विशेषणम्। विशेषण-विशेष्ययोश्च सामानाधिकरण्येन निर्देशो नीलोत्पलवत् खं ब्रह्मेति। | 'ॐ खं ब्रह्म' यह मन्त्र है। इसका कहीं अन्यत्र विनियोग नहीं हुआ, यहाँ ब्राह्मण इसका ध्यान-कर्ममें विनियोग करता है। इसमें भी 'ब्रह्म' यह विशेष्य-नाम है और 'खम्' यह विशेषण है। इस प्रकार 'नील कमल' के समान 'खं ब्रह्म' इस विशेष्य और विशेषणका यहाँ १समानाधिकरणरूपसे निर्देश किया गया |


* 'ॐ खं ब्रह्म' यह मन्त्र है। इससे आगे इसका व्याख्यानभूत ब्राह्मण है।
१. जिन पदोंकी विभक्ति, वचन और लिङ्ग एक-से हों, वे 'समानाधिकरण' होते हैं। यहाँ 'ख' और 'ब्रह्म'—दोनों ही शब्दोंमें प्रथमा विभक्ति, एकवचन और नपुंसक लिङ्ग है।

११७६ बृहदारण्यकोपनिषद् [ अध्याय ५

११७६ बृहदारण्यकोपनिषद् [ अध्याय ५


ब्रह्मशब्दो बृहद्वस्तुमात्रास्पदोऽविशेषितः, अतो विशेष्यते खं ब्रह्मेति ।है । कोई विशेषण न होनेपर 'ब्रह्म' शब्द बृहत् वस्तुमात्रका वाचक है, इसलिये इसे 'खं ब्रह्म' इस प्रकार विशेषित किया जाता है ।
यत्तत् खं ब्रह्म तदोंशब्दवाच्यमोंशब्दस्वरूपमेव वा, उभयथापि सामानाधिकरण्यमविरुद्धम् । इह च ब्रह्मोपासनसाधनत्वार्थमोंशब्दः प्रयुक्तः । तथा च श्रुत्यन्तरात्—<br>"एतदालम्बनं श्रेष्ठमेतदालम्बनं परम्" (क० उ० १ । २ । १७) "ओमित्यात्मानं युञ्जीत" (महानारा० २४ । १) "ओमित्येतेनैवाक्षरेण परं पुरुषमभिध्यायीत" (प्र० उ० ५ । ५) "ओमित्येवं ध्यायथ आत्मानम्" (मु० उ० २ । २ । ६) इत्यादेः ।वह जो खं ब्रह्म है वह ॐ शब्दवाच्य है अथवा ॐ शब्दस्वरूप ही है, दोनों ही प्रकारसे इनके समानाधिकरणत्वमें कोई विरोध नहीं आता । यहाँ ब्रह्मोपासनाके साधनार्थ होनेके कारण ॐ शब्दका प्रयोग किया गया है । ऐसा ही "यह श्रेष्ठ आलम्बन है, यह उत्कृष्ट आलम्बन है", "ॐ इस प्रकार उच्चारण कर चित्तको संयत करे", "ॐ इस अक्षरके द्वारा ही परब्रह्मका ध्यान करे", "ॐ इस प्रकार आत्माका ध्यान करो" इत्यादि अन्य श्रुतियोंसे सिद्ध होता है ।
अन्यार्थासम्भवाच्चोपदेशस्य—<br>यथान्यत्र "ओमिति शंसत्योमित्युद्गायति" (छा० उ० १ । १ । ९) इत्येवमादौ स्वाध्यायारम्भापवर्गयोश्चोङ्कारप्रयोगो विनियोगादवगम्यते, न च तथार्थान्तरमिहावगम्यते । तस्माद् ध्यानसाधनत्वेनैवेहोङ्कारशब्दस्योपदेशः ।इसके सिवा इस उपदेशका कोई दूसरा अर्थ सम्भव न होनेसे भी उसे उपासनार्थ ही मानना चाहिये । जिस प्रकार "ॐ ऐसा कहकर शस्त्रपाठ करता है, ॐ ऐसा कहकर उद्गान करता है" इत्यादि स्थलोंमें विनियोगसे स्वाध्यायके आरम्भ और अन्तमें ओङ्कारका प्रयोग विदित होता है, उस प्रकार यहाँ इसका कोई अर्थान्तर ज्ञात नहीं होता । अतः यहाँ ध्यानके साधनरूपसे ही ओङ्कार शब्दका उपदेश किया गया है ।

ब्राह्मण १] शाङ्करभाष्यार्थ ११७७

ब्राह्मण १] शाङ्करभाष्यार्थ ११७७


शाङ्करभाष्यम्भाष्यार्थ
यद्यपि ब्रह्मात्मादिशब्दा ब्रह्मणो वाचकास्तथापि श्रुतिप्रामाण्याद् ब्रह्मणो नेदिष्ठमभिधानमोङ्कारः। अत एव ब्रह्मप्रतिपत्ताविदं परं साधनम्। तच्च द्विप्रकारेण प्रतीकत्वेनाभिधानत्वेन च। प्रतीकत्वेन यथा—<br><br>विष्ण्वादिप्रतिमाभेदेनैवमोङ्कारो ब्रह्मेति प्रतिपत्तव्यः। तथा ह्योङ्कारालम्बनस्य ब्रह्म प्रसीदति—<br>“एतदालम्बनं श्रेष्ठ-<br>मेतदालम्बनं परम्।<br>एतदालम्बनं ज्ञात्वा<br>ब्रह्मलोके महीयते॥”<br>(क०उ० १।२।१७) इतिश्रुतेः।<br><br>तत्र खमिति भौतिके खे प्रतीतिर्मा भूदित्याह—खं पुराणं चिरन्तनं खं परमात्माकाशमित्यर्थः। यत्तत् परमात्माकाशं पुराणं खं तच्चक्षुराद्यविषयत्वान्नि-यद्यपि 'ब्रह्म' और 'आत्मा' आदि शब्द ब्रह्मके वाचक हैं, तथापि श्रुतिप्रामाण्यसे ब्रह्मका अत्यन्त समीपवर्ती (प्रियतम) नाम ओङ्कार है। इसीसे यह ब्रह्मकी प्राप्तिमें परम साधन है। वह साधन भी दो प्रकारसे है—प्रतीकरूपसे और नामरूपसे। प्रतीकरूपसे, जैसे—विष्णु आदिकी प्रतिमाओंका विष्णु आदिके साथ अभेदरूपसे चिन्तन किया जाता है, उसी प्रकार 'ओंकार ही ब्रह्म है' ऐसा चिन्तन करना चाहिये। इस प्रकार ओङ्कार जिसका आलम्बन है, उससे ब्रह्म प्रसन्न होता है, जैसा कि “यह श्रेष्ठ आलम्बन है, यह परम आलम्बन है' इस आलम्बनको जानकर उपासक ब्रह्मलोकमें पूजित होता है,” इस श्रुतिसे सिद्ध होता है।<br><br>यहाँ 'खम्' इससे भौतिक आकाश न समझ लिया जाय—इसलिये श्रुति कहती है¹—'खं पुराणम्'—सनातन आकाश अर्थात् परमात्माकाश। वह जो परमात्माकाशरूप पुरातन आकाश है, वह चक्षु आदिका विषय न

१. इसका विशद विचार ब्रह्मसूत्रके आकाशाधिकरणमें किया गया है। वहाँ अनेक युक्तियोंके द्वारा यह सिद्ध किया गया है कि उपनिषदोंमें आकाश, काल, इन्द्र आदि पद परमात्माके लिये ही आये हैं।

११७८ || बृहदारण्यकोपनिषद् || [अध्याय ५

११७८ || बृहदारण्यकोपनिषद् || [अध्याय ५


संस्कृतहिन्दी व्याख्या
रालम्बनमशक्यं ग्रहीतुमिति श्रद्धाभक्तिभ्यां भावविशेषेण चोङ्कार आवेशयति । यथा विष्ण्वङ्गाङ्कितायां शिलादिप्रतिमायां विष्णुं लोक एवम् ।होनेके कारण निरालम्बन है और ग्रहण नहीं किया जा सकता, इसलिये श्रुति श्रद्धाभक्तिपूर्वक भाव-विशेषके द्वारा उसका ओङ्कारमें आवेश करती है। जिस प्रकार लोक विष्णुके अङ्गोंसे अङ्कित शिलादिकी प्रतिमामें विष्णुका आवेश करता है, उसी प्रकार यहाँ समझना चाहिये।
वायुरं खं वायुरस्मिन् विद्यत इति वायुरं खं खमात्रं खमित्युच्यते न पुराणं खमित्येवमाह स्म । कोऽसौ ? कौरव्यायणीपुत्रः । वायुरे हि खे मुख्यः खशब्दव्यवहारः, तस्मान्मुख्ये सम्प्रत्ययो युक्त इति मन्यते ।'वायुरं खम्'—जिसमें वायु रहता है, ऐसा यह वायुर ख अर्थात् आकाशमात्र ही 'खम्' इस पदसे कहा जाता है, सनातन आकाश नहीं—ऐसा कहा है। वह कहने-वाला कौन है?—कौरव्यायणीपुत्र। ख शब्दका मुख्य व्यवहार वायुर आकाशमें ही है, अतः [गौण^१-मुख्य न्यायसे] इसका मुख्य अर्थमें ही प्रत्यय मानना उचित है—ऐसा वह मानता है।
तत्र यदि पुराणं खं ब्रह्म निरुपाधिकस्वरूपं यदि वा वायुरं खं सोपाधिकं ब्रह्म सर्वथाप्योङ्कारः, प्रतीकत्वेनैव प्रतिमावत् साधनत्वंसो यहाँ 'खम्' इस पदका अभिप्राय सनातन आकाशरूप निरुपाधिक ब्रह्मसे हो या वायुर आकाशरूप सोपाधिक ब्रह्मसे, सभी प्रकार प्रतिमाके समान प्रतीकरूपसे

१. 'गौणमुख्ययोर्मुख्ये कार्यसम्प्रत्ययः'—गौण और मुख्य—इनमेंसे मुख्यमें ही कार्यकी सम्यक् प्रतीति होती है—इस न्यायके अनुसार मुख्य अर्थमें प्रतीति ठीक ही है।

ब्राह्मण १ ] शाङ्करभाष्यार्थ ११७९

ब्राह्मण १ ] शाङ्करभाष्यार्थ ११७९


संस्कृत-भाष्यहिन्दी-भाष्यार्थ
प्रतिपद्यते—"एतद्वै सत्यकाम परं चापरं च ब्रह्म यदोङ्कारः” (प्र० उ० ५।२) इति श्रुत्यन्तरात्। केवलं खशब्दार्थे विप्रतिपत्तिः।ही ओङ्कारकी साधनता सिद्ध होती है, जैसा कि "हे सत्यकाम ! यह जो ओङ्कार है यही पर और अपर ब्रह्म है" इस दूसरी श्रुतिसे सिद्ध होता है। यहाँ जो मतभेद है, वह तो 'ख' शब्दके अर्थमें ही है।
वेदोऽयमोङ्कारो वेद विजानात्यनेन यद् वेदितव्यम्। तस्माद् वेद ॐकारो वाचकोऽभिधानम्। तेनाभिधानेन यद् वेदितव्यं ब्रह्म प्रकाश्यमानमभिधीयमानं वेद साधको विजानात्युपलभते। तस्माद् वेदोऽयमिति ब्राह्मणा विदुः। तस्माद् ब्राह्मणानामभिधानत्वेन साधनत्वमभिप्रेतमोङ्कारस्य।यह ओङ्कार वेद है। जो वेदितव्य है, उसका जिससे ज्ञान हो उसे 'वेद' कहते हैं। अतः ओङ्कार वेदवाचक यानी नाम है। उस नामसे जो वेदितव्य-प्रकाशित होनेवाला अर्थात् कहा जानेवाला ब्रह्म है; उसे साधक जानता यानी उपलब्ध करता है। अतः यह वेद हे-ऐसा ब्राह्मण जानते हैं। इसलिये ब्राह्मणोंको यह मान्य है कि ओङ्कार अभिधान (नाम) रूपसे ब्रह्म-साक्षात्कारका साधन है।
अथवा 'वेदोऽयम्' इत्याद्यर्थवादः। कथमोङ्कारो ब्रह्मणः प्रतीकत्वेन विहितः ? ॐ खं ब्रह्मेति सामानाधिकरण्यात् तस्य स्तुतिरिदानीं वेदत्वेन। सर्वो ह्ययं वेद ओङ्कार एव। एतत्प्रभव एतदात्मकः सर्व ऋग्यजुःसामादिभेदभिन्न एष ओङ्कारःअथवा 'वेदोऽयम्' इत्यादि वाक्य अर्थवाद है। किस प्रकार—ओङ्कारका ब्रह्मके प्रतीकरूपसे विधान किया गया है? क्योंकि 'ॐ खं ब्रह्म' इस प्रकार उनका सामानाधिकरण्य है। अब वेदरूपसे उसकी स्तुति की जाती है। यह सारा वेद ओङ्कार ही है। इससे प्रकट होनेवाला और इसीका स्वरूपभूत यह सब ऋक्, यजु और सामरूप भेदोंमें विभिन्न हुआ श्रुतिसमुदाय भी ओङ्कार ही है; जैसा कि

११८० बृहदारण्यकोपनिषद् [ अध्याय ५

११८० बृहदारण्यकोपनिषद् [ अध्याय ५

| “तद् यथा शङ्कुना सर्वाणि पर्णानि” (छा० उ० २ । २३ । ४) इत्यादिश्रुत्यन्तरात् । <br> इतश्चायं वेद ॐकारो यद् वेदितव्यं तत् सर्वं वेदितव्यमोङ्कारेणैव वेदेनेनातोऽयमोङ्कारो वेदः। इतरस्यापि वेदस्य वेदत्वमत एव तस्माद् विशिष्टोऽयमोङ्कारः साधनत्वेन प्रतिपत्तव्य इति । <br> अथवा वेदः सः, कोऽसौ ? यं ब्राह्मणा विदुराेङ्कारम् । ब्राह्मणानां ह्यसौ प्रणवोद्गीथादिविकल्पैर्विज्ञेयः । तस्मिन् हि प्रयुज्यमाने साधनत्वेन सर्वो वेदः प्रयुक्तो भवतीति ॥ १ ॥ | “जिस प्रकार शङ्कुसे सम्पूर्ण पत्ते व्याप्त रहते हैं” इत्यादि अन्य श्रुतिसे सिद्ध होता है । <br> यह वेद इसलिये भी ओङ्कार है, क्योंकि जो वेदितव्य है, वह सब इस ओङ्काररूप वेदसे ही जाना जा सकता है । अतः यह ओङ्कार वेद है इसीलिये इससे भिन्न वेदका भी वेदत्व है । उससे विशिष्ट जो यह ओङ्कार है, इसे साधनरूपसे जानना चाहिये । <br> अथवा वह वेद है । वह कौन ? जिसे ब्राह्मण ओङ्काररूपसे जानते हैं, क्योंकि यह ओङ्कार ब्राह्मणोंका प्रणव-उद्गीथादि विकल्परूपसे विज्ञेय (उपास्य) है । और उसका साधनरूपसे प्रयोग करनेपर सारे ही वेदका प्रयोग हो जाता है ॥ १ ॥ |

इति बृहदारण्यकोपनिषद्भाष्ये पञ्चमाध्याये प्रथमम् ‘ॐ खं ब्रह्म’ ब्राह्मणम् ॥ १ ॥


द्वितीय ब्राह्मण

प्रजापतिका देव, मनुष्य और असुर तीनोंको एक ही अक्षर ‘द’ से पृथक्-पृथक् दम, दान और दयाका उपदेश

| अधुना दमादिसाधनत्रयविधानाथोऽयमारम्भः— | अब दमादि तीन साधनोंका विधान करनेके लिये यह आरम्भ किया जाता है— |

ब्राह्मण २ ] शाङ्करभाष्यार्थ [ ११८१

ब्राह्मण २ ] शाङ्करभाष्यार्थ [ ११८१

त्रयाः प्राजापत्याः प्रजापतौ पितरि ब्रह्मचर्यमू-<br>षुर्देवा मनुष्या असुरा उषित्वा ब्रह्मचर्यं देवा ऊचुर्ब्र-<br>वीतु नो भवानिति तेभ्यो हैतदक्षरमुवाच द इति<br>व्यज्ञासिष्टा ३ इति व्यज्ञासिष्मेति होचुर्द्दाम्यतेति न<br>आत्थेत्योमिति होवाच व्याज्ञासिष्टेति ॥ १ ॥

देव, मनुष्य और असुर—इन प्रजापतिके तीन पुत्रोंने पिता प्रजापतिके यहाँ ब्रह्मचर्यवास किया। ब्रह्मचर्यवास कर चुकनेपर देवोंने कहा, 'आप हमें उपदेश कीजिये।' उनसे प्रजापतिने 'द' यह अक्षर कहा और पूछा 'समझ गये क्या ?' इसपर उन्होंने कहा, 'समझ गये, आपने हमसे दमन करो ऐसा कहा है।' तब प्रजापतिने कहा, 'ठीक है, तुम समझ गये' ॥ १ ॥

संस्कृत-भाष्यहिन्दी-अनुवाद
त्रयास्त्रिसंख्याकाः प्राजापत्याः प्रजापतेरपत्यानि प्राजापत्यास्ते किं प्रजापतौ पितरि ब्रह्मचर्यं शिष्यत्ववृत्तेर्ब्रह्मचर्यस्य प्राधान्याच्छिष्याः सन्तो ब्रह्मचर्यमूषुरुषितवन्त इत्यर्थः । के ते ? विशेषतो देवा मनुष्या असुराश्च । ते चोषित्वा ब्रह्मचर्यं किमकुर्वन् ? इत्युच्यते तेषां देवा ऊचुः पितरं प्रजापतिम्, किमिति ? ब्रवीतु कथयतु नः अस्मभ्यं यदनुशासनं भवानिति ।'त्रयाः'—तीनसंख्यावाले 'प्राजापत्याः'—प्रजापतिके पुत्र थे। उन्होंने क्या किया—पिता प्रजापतिके पास ब्रह्मचर्यपूर्वक वास किया—शिष्यभावसे बर्तनेवाले पुरुषके जितने धर्म हैं, उनमें ब्रह्मचर्यकी प्रधानता है, इसलिये शिष्य होकर उन्होंने ब्रह्मचर्यपूर्वक निवास किया—ऐसा इसका तात्पर्य है। वे कौन थे ? विशेषतः देव, मनुष्य और असुर। उन्होंने ब्रह्मचर्यपूर्वक निवास करके क्या किया ? सो बतलाया जाता है—उनमेंसे देवताओंने पिता प्रजापतिसे कहा। क्या कहा ? आपका हमारे लिये जो अनुशासन हो वह आप कहिये।

११८२ बृहदारण्यकोपनिषद् [ अध्याय ५

११८२ बृहदारण्यकोपनिषद् [ अध्याय ५

| तेभ्य एवमर्थिभ्यो हैतदक्षरं वर्णमात्रमुवाच द इति—उक्त्वा च तान् पप्रच्छ पिता किं व्यज्ञासिष्टा ३ इति मयोपदेशार्थमभिहितस्याक्षरस्यार्थं विज्ञातवन्त आहोस्विन्न ? इति ।<br><br>देवा ऊचुः—व्यज्ञासिष्मेति विज्ञातवन्तो वयम् । यद्येवमुच्यतां किं मयोक्तम् ? इति, देवा ऊचुः—दाम्यत—अदान्ता यूयं स्वभावतः, अतो दान्ता भवत—इति नोऽस्मानात्थ कथयसि । इतर आह—ओमिति, सम्यग् व्यज्ञासिष्टेति ॥ १ ॥ | इस प्रकार प्रार्थना करनेवाले उन देवताओंसे प्रजापतिने 'द' यह अक्षर—केवल वर्णमात्र कहा। और उनसे कहकर पिता प्रजापतिने पूछा, 'समझ गये क्या ? अर्थात् मैंने उपदेशके लिये जो अक्षर उच्चारण किया, उसका अर्थ तुम समझ गये या नहीं ?'<br><br>देवताओंने कहा, 'समझ गये, हम आपका अभिप्राय जान गये।' [ प्रजापति बोले— ] 'यदि ऐसी बात है, तो बताओ, मैंने क्या कहा है ?' देवताओंने कहा, 'आप हमसे कहते हैं, दमन–इन्द्रियनिग्रह करो, तुमलोग स्वभावसे अदान्त (अजितेन्द्रिय) हो, इसलिये दमनशील बनो।' इतर (प्रजापति) ने कहा, 'हाँ, ठीक समझे हो' ॥ १ ॥ |


अथ हैनँ मनुष्या ऊचुर्ब्रवीतु नो भगवानिति तेभ्यो हैतदेवाक्षरमुवाच द इति व्यज्ञासिष्टा ३ इति व्यज्ञासिष्मेति होचुर्दत्तेति न आत्थेत्योमिति होवाच व्यज्ञासिष्टेति ॥ २ ॥

फिर प्रजापतिसे मनुष्योंने कहा, 'आप हमें उपदेश कीजिये।' उनसे भी प्रजापतिने 'द' यह अक्षर ही कहा और पूछा, 'समझ गये क्या ?' मनुष्योंने कहा, 'समझ गये, आपने हमसे 'दान करो' ऐसा कहा है।' तब प्रजापतिने 'हां समझ गये' ऐसा कहा ॥ २ ॥

ब्राह्मण २] शाङ्करभाष्यार्थे ११८३

ब्राह्मण २] शाङ्करभाष्यार्थे ११८३


| समानमन्यत् । स्वभावतो लुब्धा यूयमतो यथाशक्ति संविभजत दत्त—इति नोऽस्मानात्थ किमन्यद् ब्रूयान्नो हितमिति मनुष्याः ॥ २ ॥ | इस मन्त्रका अन्य सब अर्थ पूर्ववत् है। ‘तुम स्वभावतः लोभी हो इसलिये यथाशक्ति संविभाग करो—दान दो—ऐसा आपने हमसे कहा है। इसके सिवा आप हमारे हितकी और क्या बात कहेंगे?’- ऐसा मनुष्योंने कहा ॥ २ ॥ |


अथ हैनमसुरा ऊचुर्ब्रवीतु नो भवानिति तेभ्यो हैतदेवाक्षरमुवाच द इति व्यज्ञासिष्टा ३ इति व्यज्ञासिष्मेति होचुर्दयध्वमिति न आत्थेत्योमिति होवाच व्यज्ञासिष्टेति तदेतदेवैषा दैवी वागनुवदति स्तनयित्नुर्द द द इति दाम्यत दत्त दयध्वमिति तदेतत् त्रयँ शिक्षेद्दमं दानं दयामिति ॥ ३ ॥

फिर प्रजापतिसे असुरोंने कहा, 'आप हमें उपदेश कीजिये।' उनसे भी प्रजापतिने 'द' यह अक्षर ही कहा और पूछा, 'समझ गये क्या?' असुरोंने कहा, 'समझ गये, आपने हमसे 'दया करो' ऐसा कहा है।' तब प्रजापतिने 'हाँ, समझ गये' ऐसा कहा। उस इस प्रजापतिके अनुशासनका मेघगर्जनारूपी दैवी वाक् आज भी द द द इस प्रकार अनुवाद करती है, अर्थात् दमन करो, दान दो, दया करो। अतः दम, दान और दया—इन तीनोंको सीखे ॥ ३ ॥

| तथा असुरा दयध्वमिति, क्रूरा यूयं हिंसादिपराः, अतो दयध्वं प्राणिषु दयां कुरुत—इति। तदेतत् प्रजापतेरनुशासन- | इसी प्रकार असुरोंने अपना अभिप्राय 'दया करो' ऐसा बतलाया, 'क्योंकि तुम क्रूर और हिंसापरायण हो, इसलिये 'दयध्वम्'—प्राणियोंपर दया करो।' प्रजापतिके इस अनुशासनकी आज भी अनु- |

११८४ | बृहदारण्यकोपनिषद् | [अध्याय ५

११८४ | बृहदारण्यकोपनिषद् | [अध्याय ५


| मद्याप्यनुवर्तत एव । यः पूर्वं प्रजापतिर्देवादीननुशशास सोऽद्याप्यनुशास्त्येव दैव्या स्तनयित्नुलक्षणया वाचा । कथम् ? एषा श्रूयते दैवी वाक् । कासौ ? स्तनयित्नुर्द द द इति दाम्यत दत्त दयध्वमित्येषां वाक्यानामुपलक्षणाय त्रिर्दकार उच्चार्यतेऽनुकृतिर्न तु स्तनयित्नुशब्दस्त्रिरेव संख्यानियमस्य लोकेऽप्रसिद्धत्वात् ।<br><br>यस्मादद्यापि प्रजापतिर्द्दाम्यत दत्त दयध्वमित्यनुशास्त्येव तस्मात् कारणादेतत्त्रयम् । किं तत्त्रयम् ? इत्युच्यते— दमं दानं दयामिति शिक्षेदुपादद्यात् प्रजापतेरनुशासनमस्माभिः कर्तव्यमित्येवं मतिं कुर्यात् । तथा च स्मृतिः—<br>“त्रिविधं नरकस्येदं<br>द्वारं नाशनमात्मनः ।<br>कामः क्रोधस्तथा लोभ-<br>स्तस्मादेतत् त्रयं त्यजेत् ॥”<br>( गीता १६ । २१ ) इति ।<br>अस्य हि विधेः शेषः पूर्वः । | वृत्ति होती ही है । जिस प्रजापतिने पूर्वकालमें देवादिका अनुशासन किया था, वह आज भी मेघगर्जनरूपी दैवी वाणीसे उनका अनुशासन करता ही है । सो किस प्रकार ? क्योंकि यह दैवी वाक् सुनी जाती है । वह दैवी वाक् क्या है ? 'द द द' ऐसी मेघगर्जना । 'दमन करो, दान दो, दया करो' इन वाक्योंको उपलक्षित करनेके लिये [दान, दया, दमनके आदि अक्षरोंके ] अनुकरणके रूपमें यह तीन बार दकारका उच्चारण हुआ है । क्योंकि मेघगर्जनका शब्द तीन बार ही होता हो—ऐसा संख्याका नियम लोकमें प्रसिद्ध नहीं है ।<br><br>क्योंकि आज भी प्रजापति 'दमन करो, दान दो, दया करो, इस प्रकार अनुशासन करता ही है, इस कारणसे इन तीनको—तीन कौन ? सो बतलाते हैं—दम, दान और दया इन तीनको सीखे--ग्रहण करे अर्थात् हमें प्रजापतिके अनुशासनका पालन करना चाहिये—ऐसी बुद्धि करे ! ऐसी ही यह स्मृति भी है—“काम, क्रोध और लोभ—ये नरकके तीन दरवाजे हैं, ये आत्माका नाश करनेवाले हैं; इसलिये इन तीनोंको त्याग दे ।'<br>इस विधिका ही पूर्वग्रन्थ शेष है । |

| ब्राह्मण २ ] | शाङ्करभाष्यार्थ | ११८४ |

ब्राह्मण २ ]शाङ्करभाष्यार्थ११८४

संस्कृत भाष्यहिन्दी अनुवाद
तथापि देवादीनुद्दिश्य किमर्थं दकारत्रयमुच्चारितवान् प्रजापतिः पृथगनुशासनार्थिभ्यः । ते वा कथं विवेकेन प्रतिपन्नाः प्रजापतेर्मनोगतं समानेनैव दकारवर्णमात्रेणेति पराभिप्रायज्ञा विकल्पयन्ति ।तो भी अलग-अलग उपदेश-ग्रहणके इच्छुक देवादिके उद्देश्यसे प्रजापतिने तीन दकारोंका उच्चारण क्यों किया और उन्होंने भी एक अक्षर दकारमात्रसे ही प्रजापतिके मनोगत भावको पृथक्-पृथक् कैसे समझ लिया--इस प्रकार दूसरोंके अभिप्रायको समझनेवाले वादीलोग विकल्प करते हैं ।
अत्रैक आहुरदान्तत्वादानत्त्वादयालृत्वैरपराधित्वमात्मनो मन्यमानाः शङ्किता एव प्रजापतावूषुः किं नो वक्ष्यतीति ? तेषां च दकारश्रवणमात्रादेवात्माशङ्कावशेन तदर्थप्रतिपत्तिरभूत् । लोकेऽपि हि प्रसिद्धम्—पुत्राः शिष्याश्चानुशास्याः सन्तो दोषान्निवर्तयितव्या इति । अतो युक्तं प्रजापतेर्दकारमात्रोच्चारणम्, दमादित्रये च दकारान्वयादात्मनो दोषानुरूप्येण देवादीनां विवेकेन प्रति-यहां एक वादीका कथन है—अदान्तता (अजितेन्द्रियता), अदानता (कंजूसी या लोभ) और अदयालुत (निर्दयता) के कारण अपनेको अपराधी मानकर शङ्कित रहते हुए ही उन्होंने यह सोचकर कि, 'देखें ये हमें क्या उपदेश देते हैं' प्रजापतिके यहां ब्रह्मचर्यपूर्वक वास किया था । अतः अपनी आशङ्काके कारण उन्हें दकारके श्रवणमात्रसे ही उस अर्थकी प्रतीति हो गयी । लोकमें भी यह प्रसिद्ध ही है कि पुत्र और शिष्य, जिनका कि अनुशासन करना हो, उन्हें पहले दोषसे ही निवृत्त करना चाहिये । अतः प्रजापतिका दकारमात्र उच्चारण करना उचित ही है । तथा दमादि तीनोंमें दकारका अन्वय होनेसे अपने दोषके अनुसार देवादिका उन्हें अलग-अलग समझ लेना

बृ० उ० ७५—

| ११८६ | बृहदारण्यकोपनिषद् | [अध्याय ५ |

११८६बृहदारण्यकोपनिषद्[अध्याय ५
संस्कृत-भाष्यहिन्दी-अनुवाद
पक्तुं चेति। फलं त्वेतदात्मदोषज्ञाने सति दोषान्निवर्तयितुं शक्यतेऽल्पेनाप्युपदेशेन यथा देवादयो दकारमात्रेणेति।भी उचित ही है। इसका फल तो यही है कि अपने दोषका ज्ञान होनेपर थोड़े-से उपदेशसे भी दोषसे निवृत्त किया जा सकता है, जैसे कि दकारमात्रसे देवादिको निवृत्त कर दिया गया था।
नन्वेतत् त्रयाणां देवादीनामनुशासनं देवादिभिरप्येकैकमेवोपादेयमद्यत्वेऽपि न तु त्रयं मनुष्यैः शिक्षितव्यमिति।शङ्का—किंतु यह देवता आदि तीनोंको उपदेश किया गया और उन देवादिकोंके लिये इनमेंसे एक-एक ही उपादेय हुआ; अतः आजकल भी मनुष्योंको उन तीनोंहीके सीखनेकी आवश्यकता नहीं है।
अत्रोच्यते—पूर्वैर्देवादिभिर्विशिष्टैरनुष्ठितमेतत् त्रयं तस्मान्मनुष्यैरेव शिक्षितव्यमिति।समाधान—यहाँ कहना यह है कि पूर्ववर्ती देवता आदि विशिष्ट व्यक्तियोंने इन तीनों साधनोंका अनुष्ठान किया था, अतः मनुष्योंको भी इन्हें सीखना ही चाहिये।
तत्र दयालुत्वस्याननुष्ठेयत्वं स्यात्, कथम्? असुरैरप्रशस्तैरनुष्ठितत्वादिति चेत्।शङ्का—ऐसी स्थितिमें भी दयालुता अनुष्ठानके योग्य नहीं हो सकती; यदि कहो क्यों? तो इसलिये कि इसका नीच असुरोंद्वारा अनुष्ठान किया गया था।
न, तुल्यत्वात् त्रयाणाम्, अतोऽन्योऽत्राभिप्रायः प्रजापतेः पुत्रा देवादयस्त्रयः, पुत्रेभ्यश्च हितमेव पित्रोपदेष्टव्यम्, प्रजापतिश्च हितज्ञो नान्यथोपदिशति, तस्मात्समाधान—नहीं, क्योंकि ये तीनों समान ही हैं; अतः यहाँ इससे दूसरा अभिप्राय है—देवादि तीनों प्रजापतिके पुत्र हैं और पुत्रोंको पिताके द्वारा हितकी बातका ही उपदेश किया जाना चाहिये। प्रजापति भी उनके हितकी बात जाननेवाले हैं, इसलिये उन्हें अहितका उपदेश नहीं करते।

| ब्राह्मण २ ] | शाङ्करभाष्यार्थ | ११८७ |

ब्राह्मण २ ]शाङ्करभाष्यार्थ११८७
संस्कृत-भाष्यहिन्दी-अनुवाद
पुत्रानुशासनं प्रजापतेः परम-<br>मेतद्धितम्, अतो मनुष्यैरेवैतत्<br>त्रयं शिक्षितव्यमिति ।<br><br>अथवा न देवा असुरा वा<br>अन्ये केचन विद्यन्ते मनुष्येभ्यः,<br>मनुष्याणामेवादान्ता येऽन्यैरुत्तमै-<br>र्गुणैः संपन्नास्ते देवाः, लोभ-<br>प्रधाना मनुष्याः, तथा हिंसापराः<br>क्रूरा असुराः, त एव मनुष्या<br>अदान्तत्वादिदोषत्रयमपेक्ष्य<br>देवादिशब्दभाजो भवन्ति,<br>इतरांश्च गुणान् सत्त्वरजस्तमांस्य-<br>पेक्ष्य । अतो मनुष्यैरेव शिक्षि-<br>तव्यमेतत् त्रयमिति, तदपेक्षयैव<br>प्रजापतिनोपदिष्टत्वात् । तथा<br>हि मनुष्या अदान्ता लुब्धाः<br>क्रूराश्च दृश्यन्ते, तथा च स्मृतिः—<br>“कामः क्रोधस्तथा लोभस्त-<br>स्मादेतत् त्रयं त्यजेत् ।” (गीता<br>१६ । २१) इति ॥ ३ ॥अतः प्रजापतिको यह पुत्रोंको दिया<br>हुआ उपदेश उनका परम हित है।<br>इसलिये मनुष्योंको भी इन तीनों-<br>हीकी शिक्षा लेनी चाहिये ।<br><br>अथवा यों समझो कि यहां<br>मनुष्योंसे भिन्न कोई देव या असुर<br>नहीं हैं; मनुष्योंमें ही जो दमन-<br>शील नहीं हैं, किंतु अन्य उत्तम<br>गुणोंसे सम्पन्न हैं उन्हें ही देव कहा<br>है, लोभप्रधान व्यक्ति मनुष्य कहे<br>गये हैं तथा हिंसापरायण और क्रूर<br>व्यक्ति असुर हैं। वे मनुष्य ही<br>अदान्तता आदि तीन दोषोंकी<br>अपेक्षासे तथा सत्त्व, रज और तम-<br>इन अन्य गुणोंके अनुसार देवता<br>आदि नाम धारण करते हैं। अतः<br>ये तीनों साधन मनुष्योंको ही<br>सीखने चाहिये; क्योंकि उनके<br>उद्देश्यसे ही प्रजापतिने इनका<br>उपदेश किया है। तथा मनुष्य अ-<br>जितेन्द्रिय, लोभी और क्रूर प्रकृति-<br>के देखे भी जाते ही हैं, ऐसा ही<br>यह स्मृति भी कहती है—"काम,<br>क्रोध और लोभ [ ये तीन नरकके<br>द्वार हैं ] अतः इन तीनोंका त्याग<br>करना चाहिये" ॥ ३ ॥

इति बृहदारण्यकोपनिषद्भाष्ये पञ्चमाध्याये
द्वितीयं प्राजापत्यब्राह्मणम् ॥ २ ॥

तृतीय ब्राह्मण

तृतीय ब्राह्मण

हृदय-ब्रह्मकी उपासना

दमादिसाधनत्रयं सर्वोपासनशेषं विहितम्। दान्तोऽलुब्धो दयालुः सन् सर्वोपासनेष्वधिक्रियते। तत्र निरुपाधिकस्य ब्रह्मणो दर्शनमतिक्रान्तम्, अथाधुना सोपाधिकस्य तस्यैवाभ्युदयफलानि वक्तव्यानि, इत्येवमर्थोऽयमारम्भः—समस्त उपासनाओंके अङ्गभूत दमादि तीन साधनोंका विधान किया गया। दमनशील, निर्लोभ और दयालु होनेपर ही पुरुषका सारी उपासनाओंमें अधिकार होता है। वहाँ निरुपाधिक ब्रह्म-ज्ञानका निरूपण तो समाप्त हो चुका, अब सोपाधिक ब्रह्मकी अभ्युदयरूप फलवाली उपासनाएँ बतलानी हैं, इसीके लिये आरम्भ किया जाता है—

एष प्रजापतिर्यद्धृदयमेतद् ब्रह्मैतत् सर्वं तदेतत् त्र्यक्षरꣳ हृदयमिति ह इत्येकमक्षरमभिहरन्त्यस्मै स्वाश्चान्ये च य एवं वेद द इत्येकमक्षरं ददत्यस्मै स्वाश्चान्ये च य एवं वेद यमित्येकमक्षरमेति स्वर्गं लोकं य एवं वेद ॥ १ ॥

जो हृदय है, वह प्रजापति है। यह ब्रह्म है, यह सर्व है, यह हृदय तीन अक्षरवाला नाम है। 'हृ' यह एक अक्षर है। जो ऐसा जानता है, उसके प्रति स्वजन और अन्यजन बलि समर्पण करते हैं। 'द' यह एक अक्षर है। जो ऐसा जानता है, उसे स्वजन और अन्यजन देते हैं। 'यम्' यह एक अक्षर है। जो ऐसा जानता है, वह स्वर्गलोकको जाता है ॥१॥

एष प्रजापतिर्यद्धृदयं प्रजापतिरनुशास्तीत्यनन्तरमेवाभिहितम्। कः पुनरसावनुशास्ता प्रजापतिः ? इत्युच्यते—एष प्रजापतिःजो हृदय है वह प्रजापति है। प्रजापति अनुशासन करता है—यह अभी कहा जा चुका है। किंतु यह अनुशासनकर्ता प्रजापति कौन है ? सो बतलाया जाता है--यह प्रजापति

| ब्राह्मण ३ ] | शाङ्करभाष्यार्थ | ११८६ |

ब्राह्मण ३ ]शाङ्करभाष्यार्थ११८६
संस्कृतहिन्दी
कोऽसौ ? यद् हृदयं हृदयमिति हृदयस्था बुद्धिरुच्यते । यस्मिञ्छाकल्यब्राह्मणान्ते नामरूपकर्मणामुपसंहार उक्तो दिग्भागद्वारेण, तदेतत् सर्वभूतप्रतिष्ठं सर्वभूतात्मभूतं हृदयं प्रजापतिः प्रजानां स्रष्टा । एतद् ब्रह्म—बृहत्त्वात् सर्वात्मत्वाच्च ब्रह्म; एतत् सर्वम्; उक्तं पञ्चमाध्याये हृदयस्य सर्वत्वम् । तत् सर्वं यस्मात् तस्मादुपास्यं हृदयं ब्रह्म ।<br><br>तत्र हृदयनामाक्षरविषयमेव तावदुपासनमुच्यते । तदेतद् हृदयमिति नाम त्र्यक्षरम्, त्रीण्यक्षराण्‍यस्येति त्र्यक्षरम् । कानि पुनस्तानि त्रीण्यक्षराण्युच्यन्ते ? हृ इत्येकमक्षरम्, अभिहरन्ति हृतेराहृतिकर्मणो हृ इत्येतद् रूपमिति यो वेद यस्माद् हृदयाय ब्रह्मणे स्वाश्चेन्द्रियाण्यन्ये च विषयाः शब्दादयः स्वं स्वंहै । वह कौन है ? जो हृदय है । 'हृदयम्' इस पदके द्वारा हृदयस्था बुद्धि कही जाती है । जिसमें कि शाकल्यब्राह्मणके अन्तमें दिग्भागके द्वारा नाम, रूप और कर्मोंका उपसंहार बतलाया गया है । वह यह सम्पूर्ण भूतोंमें प्रतिष्ठित तथा सबका आत्मस्वरूप हृदय प्रजापति—प्रजाओंका रचयिता है । यह ब्रह्म है—बृहत् तथा सबका आत्मा होनेके कारण यह ब्रह्म है । यह सर्व है । पञ्चम अध्यायमें हृदयके सर्वत्वका वर्णन किया जा चुका है । क्योंकि वह सर्व है, इसलिये वह हृदयरूप ब्रह्म उपास्य है ।<br><br>अब 'हृदय' इस नामके अक्षरोंसे सम्बन्ध रखनेवाली उपासना ही बतलायी जाती है । वह यह 'हृदयम्' ऐसा नाम त्र्यक्षर है, इसके तीन ही अक्षर हैं, इसलिये यह त्र्यक्षर है । वे तीन अक्षर कौन-से हैं, सो बतलाये जाते हैं । 'हृ' यह एक अक्षर है । 'अभिहरन्ति'—आहरण जिसका कर्म है, उस 'हृ' धातुका 'हृ' यह रूप है; जो ऐसा जानता है; [उसको मिलनेवाला फल बताते हैं] चूँकि हृदयरूप ब्रह्मके प्रति ही 'स्वाः'—इन्द्रियाँ और शब्दादि दूसरे

११९० | बृहदारण्यकोपनिषद | [अध्याय ५

११९०बृहदारण्यकोपनिषद[अध्याय ५
संस्कृत-भाष्यहिन्दी-अनुवाद
कार्यमभिहरन्ति हृदयं च भोक्त्रर्थमभिहरति । अतो हृदयनाम्नो हृ इत्येतदक्षरमिति यो वेदास्मै विदुषेऽभिहरन्ति स्वाश्च ज्ञातयोऽन्ये चासंबद्धाः; बलिमिति वाक्यशेषः । विज्ञानानुरूप्येणैतत् फलम् ।विषय अपने-अपने कार्यका अभिहरण करते हैं और हृदय उन्हें भोक्ताके प्रति ले जाता है । अतः 'हृदय' नामका 'हृ' यह एक अक्षर है—ऐसा जो जानता है उस विद्वान्के प्रति 'स्वाः'—उसके सजातीय और 'अन्ये'—दूसरे असम्बद्ध पुरुष बलि अभिहरण करते हैं । 'बलिम्' यह वाक्यशेष है । विज्ञान (उपासना) के अनुरूप ही यह फल है ।
तथा द इत्येतदप्येकाक्षरमेतदपि दानार्थस्य ददातेर्द इत्येतद् रूपं हृदयनामाक्षरत्वेन निबद्धम् । अत्रापि—हृदयाय ब्रह्मणे स्वाश्च करणान्यन्ये च विषयाः स्वं स्वं वीर्यं ददति हृदयं च भोक्त्रे ददाति स्वं वीर्यमतो दकार इत्येवं यो वेदास्मै ददति स्वाश्चान्ये च ।तथा 'द' यह भी एक अक्षर है । यह भी दानार्थक 'दा' धातुका 'द' यह रूप 'हृदय' नामके अक्षररूपसे निबद्ध है । यहाँ भी हृदयरूप ब्रह्मको 'स्वाः'—इन्द्रियाँ और 'अन्ये'- अर्थात् अन्यान्य विषय अपना-अपना वीर्य देते हैं । हृदय भी भोक्ताको अपना वीर्य देता है । अतः जो दकार इस प्रकारसे उसे जानता है, उसे स्वजन और अन्यजन देते हैं ।
तथा यमित्येतदप्येकमक्षरम्, इणो गत्यर्थस्य यमित्येतद् रूपमस्मिन्नाम्नि निबद्धमिति यो वेद स स्वर्गं लोकमेति । एवं नामाक्षरादपीदृशं विशिष्टं फलं प्रा-तथा 'यम्' यह भी एक अक्षर है । गत्यर्थक 'इण्' धातुका 'यम्' यह रूप इस नाममें निबद्ध है—ऐसा जो जानता है, वह स्वर्गलोकको जाता है । इस प्रकार नामके अक्षरमात्रसे जब पुरुष ऐसा विशिष्ट फल