बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Brihadaranyaka Upanishad with Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
DevanagariSanskritpublished1,402 पृष्ठ
पृष्ठ 1204, कुल 1402 में से
संदर्भ में पढ़ेंपृष्ठ 1204
| ११९० | बृहदारण्यकोपनिषद | [अध्याय ५ |
|---|
| संस्कृत-भाष्य | हिन्दी-अनुवाद |
|---|---|
| कार्यमभिहरन्ति हृदयं च भोक्त्रर्थमभिहरति । अतो हृदयनाम्नो हृ इत्येतदक्षरमिति यो वेदास्मै विदुषेऽभिहरन्ति स्वाश्च ज्ञातयोऽन्ये चासंबद्धाः; बलिमिति वाक्यशेषः । विज्ञानानुरूप्येणैतत् फलम् । | विषय अपने-अपने कार्यका अभिहरण करते हैं और हृदय उन्हें भोक्ताके प्रति ले जाता है । अतः 'हृदय' नामका 'हृ' यह एक अक्षर है—ऐसा जो जानता है उस विद्वान्के प्रति 'स्वाः'—उसके सजातीय और 'अन्ये'—दूसरे असम्बद्ध पुरुष बलि अभिहरण करते हैं । 'बलिम्' यह वाक्यशेष है । विज्ञान (उपासना) के अनुरूप ही यह फल है । |
| तथा द इत्येतदप्येकाक्षरमेतदपि दानार्थस्य ददातेर्द इत्येतद् रूपं हृदयनामाक्षरत्वेन निबद्धम् । अत्रापि—हृदयाय ब्रह्मणे स्वाश्च करणान्यन्ये च विषयाः स्वं स्वं वीर्यं ददति हृदयं च भोक्त्रे ददाति स्वं वीर्यमतो दकार इत्येवं यो वेदास्मै ददति स्वाश्चान्ये च । | तथा 'द' यह भी एक अक्षर है । यह भी दानार्थक 'दा' धातुका 'द' यह रूप 'हृदय' नामके अक्षररूपसे निबद्ध है । यहाँ भी हृदयरूप ब्रह्मको 'स्वाः'—इन्द्रियाँ और 'अन्ये'- अर्थात् अन्यान्य विषय अपना-अपना वीर्य देते हैं । हृदय भी भोक्ताको अपना वीर्य देता है । अतः जो दकार इस प्रकारसे उसे जानता है, उसे स्वजन और अन्यजन देते हैं । |
| तथा यमित्येतदप्येकमक्षरम्, इणो गत्यर्थस्य यमित्येतद् रूपमस्मिन्नाम्नि निबद्धमिति यो वेद स स्वर्गं लोकमेति । एवं नामाक्षरादपीदृशं विशिष्टं फलं प्रा- | तथा 'यम्' यह भी एक अक्षर है । गत्यर्थक 'इण्' धातुका 'यम्' यह रूप इस नाममें निबद्ध है—ऐसा जो जानता है, वह स्वर्गलोकको जाता है । इस प्रकार नामके अक्षरमात्रसे जब पुरुष ऐसा विशिष्ट फल |