बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Brihadaranyaka Upanishad with Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 1205, कुल 1402 में से
संदर्भ में पढ़ेंब्राह्मण ४ ] शाङ्करभाष्यार्थे ११९१
| प्नोति किमु वक्तव्यं हृदयस्वरूपो-<br><br>पासनादिति हृदयस्तुतये नामा-<br><br>क्षरोपन्यासः ॥ १ ॥ | प्राप्त कर लेता है तो हृदयस्वरूप ब्रह्मकी उपासनासे जो फल मिलेगा उसके विषयमें तो कहना ही क्या है ? इस प्रकार हृदयकी स्तुतिके लिये उस नामके अक्षरोंका उपन्यास किया गया है ॥ १ ॥ |
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इति बृहदारण्यकोपनिषद्भाष्ये पञ्चमाध्याये तृतीयं हृदयब्राह्मणम् ॥ ३ ॥
चतुर्थ ब्राह्मण
सत्य-ब्रह्मकी उपासना
| तस्यैव हृदयाख्यस्य ब्रह्मणः सत्यमित्युपासनं विधित्सन्नाह— | उस हृदयसंज्ञक ब्रह्मकी ही 'सत्य' ऐसी उपासनाका विधान करनेकी इच्छासे श्रुति कहती है— |
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तद् वै तदेतदेव तदास सत्यमेव स यो हैतं महद् यक्षं प्रथमजं वेद सत्यं ब्रह्मेति जयतीमाँल्लोका-ञ्जित इन्न्वसावसद्य एवमेतन्महद् यक्षं प्रथमजं वेद सत्यं ब्रह्मेति सत्यँ ह्येव ब्रह्म ॥ १ ॥
वही—वह हृदय-ब्रह्म ही वह था जो कि सत्य ही है। जो भी इस महत्, यक्ष (पूज्य) प्रथम उत्पन्न हुएको 'यह सत्य ब्रह्म है' ऐसा जानता है, वह इन लोकोंको जीत लेता है। [उसका शत्रु] उसके अधीन हो जाता है—असत् (अभावभूत) हो जाता है। जो इस प्रकार इस महत्, यक्ष (पूजनीय) प्रथम उत्पन्न हुएको 'सत्य ब्रह्म'—इस प्रकार जानता है [उसे उपर्युक्त फल मिलता है], क्योंकि ब्रह्म सत्य ही है ॥ १ ॥