बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Brihadaranyaka Upanishad with Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
DevanagariSanskritpublished1,402 पृष्ठ
पृष्ठ 1186, कुल 1402 में से
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११७२ बृहदारण्यकोपनिषद् [ अध्याय ५
| संस्कृत | हिन्दी |
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| कस्यचित् स्यात्, येन द्वैतस्य सत्यत्वमुपादिश्य पश्चादात्मनः प्रामाण्यं प्रतिपादयेच्छास्त्रम् । नापि पाषण्डिभिरपि प्रस्थापिताः शास्त्रस्य प्रामाण्यं न गृह्णीयुः । | जिससे कि शास्त्र उसे द्वैतका सत्यत्व समझाकर फिर अपनी प्रामाणिकताका प्रतिपादन करे । तथा [ बौद्धादि ] पाखण्डियोंद्वारा श्रेयोमार्गमें प्रवृत्त किये हुए शिष्य-गण भी शास्त्रका प्रामाण्य स्वीकार न करें-ऐसी बात भी नहीं है । |
| तस्माद् यथाप्राप्तमेव द्वैतमविद्याकृतं स्वाभाविकमुपादाय स्वाभाविक्यैवाविद्यया युक्ताय रागद्वेषादिदोषवते यथाभिमतपुरुषार्थसाधनं कर्मोपदिशत्यग्रे पश्चात् प्रसिद्धक्रियाकारकफलस्वरूपदोषदर्शनवते तद्विपरीतौदासीन्यस्वरूपावस्थानफलार्थिने तदुपायभूतामात्मैकत्वदर्शनात्मिकां ब्रह्मविद्यामुपदिशति । अथैवं सति तदौदासीन्यस्वरूपावस्थाने फले प्राप्ते शास्त्रस्य प्रामाण्यं प्रत्यर्थित्वं निवर्तते । तदभावाच्छास्त्रस्यापि शास्त्रत्वं तं प्रति निवर्तत एव । | अतः अविद्याकृत यथाप्राप्त स्वाभाविक द्वैतको ही ग्रहणकर जो स्वाभाविक अविद्यासे युक्त और रागद्वेषवान् है, उस पुरुषको शास्त्र पहले उसके अभिमत कर्मरूप पुरुषार्थके साधनका उपदेश करता है । पीछे जो प्रसिद्ध क्रिया, कारक और फलस्वरूप कर्ममें दोष देखनेवाला तथा उससे विपरीत उदासीनरूपसे स्थितिरूप फलका इच्छुक होता है, उसे ही वह उसकी उपायभूता आत्मैकत्वदर्शनरूपा ब्रह्मविद्याका उपदेश करता है । फिर ऐसा होनेपर उस औदासीन्यस्वरूपमें स्थितिरूप फलकी प्राप्ति हो जानेपर शास्त्रके प्रामाण्यके प्रति आकांक्षाकी निवृत्ति हो जाती है । उसका अभाव हो जानेपर उसके लिये शास्त्रका शास्त्रत्व भी निवृत्त हो ही जाता है । |
| तथा प्रतिपुरुषं परिसमाप्तं शास्त्रमिति न शास्त्रविरोधगन्धो- | इस प्रकार प्रत्येक पुरुषके प्रति शास्त्रका प्रयोजन पूरा हो जाता है, इसलिये शास्त्रके विरोधकी तो गन्ध |