बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Brihadaranyaka Upanishad with Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
DevanagariSanskritpublished1,402 पृष्ठ
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११७६ बृहदारण्यकोपनिषद् [ अध्याय ५
| ब्रह्मशब्दो बृहद्वस्तुमात्रास्पदोऽविशेषितः, अतो विशेष्यते खं ब्रह्मेति । | है । कोई विशेषण न होनेपर 'ब्रह्म' शब्द बृहत् वस्तुमात्रका वाचक है, इसलिये इसे 'खं ब्रह्म' इस प्रकार विशेषित किया जाता है । |
| यत्तत् खं ब्रह्म तदोंशब्दवाच्यमोंशब्दस्वरूपमेव वा, उभयथापि सामानाधिकरण्यमविरुद्धम् । इह च ब्रह्मोपासनसाधनत्वार्थमोंशब्दः प्रयुक्तः । तथा च श्रुत्यन्तरात्—<br>"एतदालम्बनं श्रेष्ठमेतदालम्बनं परम्" (क० उ० १ । २ । १७) "ओमित्यात्मानं युञ्जीत" (महानारा० २४ । १) "ओमित्येतेनैवाक्षरेण परं पुरुषमभिध्यायीत" (प्र० उ० ५ । ५) "ओमित्येवं ध्यायथ आत्मानम्" (मु० उ० २ । २ । ६) इत्यादेः । | वह जो खं ब्रह्म है वह ॐ शब्दवाच्य है अथवा ॐ शब्दस्वरूप ही है, दोनों ही प्रकारसे इनके समानाधिकरणत्वमें कोई विरोध नहीं आता । यहाँ ब्रह्मोपासनाके साधनार्थ होनेके कारण ॐ शब्दका प्रयोग किया गया है । ऐसा ही "यह श्रेष्ठ आलम्बन है, यह उत्कृष्ट आलम्बन है", "ॐ इस प्रकार उच्चारण कर चित्तको संयत करे", "ॐ इस अक्षरके द्वारा ही परब्रह्मका ध्यान करे", "ॐ इस प्रकार आत्माका ध्यान करो" इत्यादि अन्य श्रुतियोंसे सिद्ध होता है । |
| अन्यार्थासम्भवाच्चोपदेशस्य—<br>यथान्यत्र "ओमिति शंसत्योमित्युद्गायति" (छा० उ० १ । १ । ९) इत्येवमादौ स्वाध्यायारम्भापवर्गयोश्चोङ्कारप्रयोगो विनियोगादवगम्यते, न च तथार्थान्तरमिहावगम्यते । तस्माद् ध्यानसाधनत्वेनैवेहोङ्कारशब्दस्योपदेशः । | इसके सिवा इस उपदेशका कोई दूसरा अर्थ सम्भव न होनेसे भी उसे उपासनार्थ ही मानना चाहिये । जिस प्रकार "ॐ ऐसा कहकर शस्त्रपाठ करता है, ॐ ऐसा कहकर उद्गान करता है" इत्यादि स्थलोंमें विनियोगसे स्वाध्यायके आरम्भ और अन्तमें ओङ्कारका प्रयोग विदित होता है, उस प्रकार यहाँ इसका कोई अर्थान्तर ज्ञात नहीं होता । अतः यहाँ ध्यानके साधनरूपसे ही ओङ्कार शब्दका उपदेश किया गया है । |