बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Brihadaranyaka Upanishad with Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
DevanagariSanskritpublished1,402 पृष्ठ
पृष्ठ 1195, कुल 1402 में से
संदर्भ में पढ़ेंपृष्ठ 1195
ब्राह्मण २ ] शाङ्करभाष्यार्थ [ ११८१
त्रयाः प्राजापत्याः प्रजापतौ पितरि ब्रह्मचर्यमू-<br>षुर्देवा मनुष्या असुरा उषित्वा ब्रह्मचर्यं देवा ऊचुर्ब्र-<br>वीतु नो भवानिति तेभ्यो हैतदक्षरमुवाच द इति<br>व्यज्ञासिष्टा ३ इति व्यज्ञासिष्मेति होचुर्द्दाम्यतेति न<br>आत्थेत्योमिति होवाच व्याज्ञासिष्टेति ॥ १ ॥
देव, मनुष्य और असुर—इन प्रजापतिके तीन पुत्रोंने पिता प्रजापतिके यहाँ ब्रह्मचर्यवास किया। ब्रह्मचर्यवास कर चुकनेपर देवोंने कहा, 'आप हमें उपदेश कीजिये।' उनसे प्रजापतिने 'द' यह अक्षर कहा और पूछा 'समझ गये क्या ?' इसपर उन्होंने कहा, 'समझ गये, आपने हमसे दमन करो ऐसा कहा है।' तब प्रजापतिने कहा, 'ठीक है, तुम समझ गये' ॥ १ ॥
| संस्कृत-भाष्य | हिन्दी-अनुवाद |
|---|---|
| त्रयास्त्रिसंख्याकाः प्राजापत्याः प्रजापतेरपत्यानि प्राजापत्यास्ते किं प्रजापतौ पितरि ब्रह्मचर्यं शिष्यत्ववृत्तेर्ब्रह्मचर्यस्य प्राधान्याच्छिष्याः सन्तो ब्रह्मचर्यमूषुरुषितवन्त इत्यर्थः । के ते ? विशेषतो देवा मनुष्या असुराश्च । ते चोषित्वा ब्रह्मचर्यं किमकुर्वन् ? इत्युच्यते तेषां देवा ऊचुः पितरं प्रजापतिम्, किमिति ? ब्रवीतु कथयतु नः अस्मभ्यं यदनुशासनं भवानिति । | 'त्रयाः'—तीनसंख्यावाले 'प्राजापत्याः'—प्रजापतिके पुत्र थे। उन्होंने क्या किया—पिता प्रजापतिके पास ब्रह्मचर्यपूर्वक वास किया—शिष्यभावसे बर्तनेवाले पुरुषके जितने धर्म हैं, उनमें ब्रह्मचर्यकी प्रधानता है, इसलिये शिष्य होकर उन्होंने ब्रह्मचर्यपूर्वक निवास किया—ऐसा इसका तात्पर्य है। वे कौन थे ? विशेषतः देव, मनुष्य और असुर। उन्होंने ब्रह्मचर्यपूर्वक निवास करके क्या किया ? सो बतलाया जाता है—उनमेंसे देवताओंने पिता प्रजापतिसे कहा। क्या कहा ? आपका हमारे लिये जो अनुशासन हो वह आप कहिये। |