भारतकोश
बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

Brihadaranyaka Upanishad with Shankara Bhashya

आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished1,402 पृष्ठ

पृष्ठ 1197, कुल 1402 में से

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पृष्ठ 1197

ब्राह्मण २] शाङ्करभाष्यार्थे ११८३


| समानमन्यत् । स्वभावतो लुब्धा यूयमतो यथाशक्ति संविभजत दत्त—इति नोऽस्मानात्थ किमन्यद् ब्रूयान्नो हितमिति मनुष्याः ॥ २ ॥ | इस मन्त्रका अन्य सब अर्थ पूर्ववत् है। ‘तुम स्वभावतः लोभी हो इसलिये यथाशक्ति संविभाग करो—दान दो—ऐसा आपने हमसे कहा है। इसके सिवा आप हमारे हितकी और क्या बात कहेंगे?’- ऐसा मनुष्योंने कहा ॥ २ ॥ |


अथ हैनमसुरा ऊचुर्ब्रवीतु नो भवानिति तेभ्यो हैतदेवाक्षरमुवाच द इति व्यज्ञासिष्टा ३ इति व्यज्ञासिष्मेति होचुर्दयध्वमिति न आत्थेत्योमिति होवाच व्यज्ञासिष्टेति तदेतदेवैषा दैवी वागनुवदति स्तनयित्नुर्द द द इति दाम्यत दत्त दयध्वमिति तदेतत् त्रयँ शिक्षेद्दमं दानं दयामिति ॥ ३ ॥

फिर प्रजापतिसे असुरोंने कहा, 'आप हमें उपदेश कीजिये।' उनसे भी प्रजापतिने 'द' यह अक्षर ही कहा और पूछा, 'समझ गये क्या?' असुरोंने कहा, 'समझ गये, आपने हमसे 'दया करो' ऐसा कहा है।' तब प्रजापतिने 'हाँ, समझ गये' ऐसा कहा। उस इस प्रजापतिके अनुशासनका मेघगर्जनारूपी दैवी वाक् आज भी द द द इस प्रकार अनुवाद करती है, अर्थात् दमन करो, दान दो, दया करो। अतः दम, दान और दया—इन तीनोंको सीखे ॥ ३ ॥

| तथा असुरा दयध्वमिति, क्रूरा यूयं हिंसादिपराः, अतो दयध्वं प्राणिषु दयां कुरुत—इति। तदेतत् प्रजापतेरनुशासन- | इसी प्रकार असुरोंने अपना अभिप्राय 'दया करो' ऐसा बतलाया, 'क्योंकि तुम क्रूर और हिंसापरायण हो, इसलिये 'दयध्वम्'—प्राणियोंपर दया करो।' प्रजापतिके इस अनुशासनकी आज भी अनु- |