बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Brihadaranyaka Upanishad with Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 1198, कुल 1402 में से
संदर्भ में पढ़ें११८४ | बृहदारण्यकोपनिषद् | [अध्याय ५
| मद्याप्यनुवर्तत एव । यः पूर्वं प्रजापतिर्देवादीननुशशास सोऽद्याप्यनुशास्त्येव दैव्या स्तनयित्नुलक्षणया वाचा । कथम् ? एषा श्रूयते दैवी वाक् । कासौ ? स्तनयित्नुर्द द द इति दाम्यत दत्त दयध्वमित्येषां वाक्यानामुपलक्षणाय त्रिर्दकार उच्चार्यतेऽनुकृतिर्न तु स्तनयित्नुशब्दस्त्रिरेव संख्यानियमस्य लोकेऽप्रसिद्धत्वात् ।<br><br>यस्मादद्यापि प्रजापतिर्द्दाम्यत दत्त दयध्वमित्यनुशास्त्येव तस्मात् कारणादेतत्त्रयम् । किं तत्त्रयम् ? इत्युच्यते— दमं दानं दयामिति शिक्षेदुपादद्यात् प्रजापतेरनुशासनमस्माभिः कर्तव्यमित्येवं मतिं कुर्यात् । तथा च स्मृतिः—<br>“त्रिविधं नरकस्येदं<br>द्वारं नाशनमात्मनः ।<br>कामः क्रोधस्तथा लोभ-<br>स्तस्मादेतत् त्रयं त्यजेत् ॥”<br>( गीता १६ । २१ ) इति ।<br>अस्य हि विधेः शेषः पूर्वः । | वृत्ति होती ही है । जिस प्रजापतिने पूर्वकालमें देवादिका अनुशासन किया था, वह आज भी मेघगर्जनरूपी दैवी वाणीसे उनका अनुशासन करता ही है । सो किस प्रकार ? क्योंकि यह दैवी वाक् सुनी जाती है । वह दैवी वाक् क्या है ? 'द द द' ऐसी मेघगर्जना । 'दमन करो, दान दो, दया करो' इन वाक्योंको उपलक्षित करनेके लिये [दान, दया, दमनके आदि अक्षरोंके ] अनुकरणके रूपमें यह तीन बार दकारका उच्चारण हुआ है । क्योंकि मेघगर्जनका शब्द तीन बार ही होता हो—ऐसा संख्याका नियम लोकमें प्रसिद्ध नहीं है ।<br><br>क्योंकि आज भी प्रजापति 'दमन करो, दान दो, दया करो, इस प्रकार अनुशासन करता ही है, इस कारणसे इन तीनको—तीन कौन ? सो बतलाते हैं—दम, दान और दया इन तीनको सीखे--ग्रहण करे अर्थात् हमें प्रजापतिके अनुशासनका पालन करना चाहिये—ऐसी बुद्धि करे ! ऐसी ही यह स्मृति भी है—“काम, क्रोध और लोभ—ये नरकके तीन दरवाजे हैं, ये आत्माका नाश करनेवाले हैं; इसलिये इन तीनोंको त्याग दे ।'<br>इस विधिका ही पूर्वग्रन्थ शेष है । |