भारतकोश
बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

Brihadaranyaka Upanishad with Shankara Bhashya

आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished1,402 पृष्ठ

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पृष्ठ 1201
ब्राह्मण २ ]शाङ्करभाष्यार्थ११८७
संस्कृत-भाष्यहिन्दी-अनुवाद
पुत्रानुशासनं प्रजापतेः परम-<br>मेतद्धितम्, अतो मनुष्यैरेवैतत्<br>त्रयं शिक्षितव्यमिति ।<br><br>अथवा न देवा असुरा वा<br>अन्ये केचन विद्यन्ते मनुष्येभ्यः,<br>मनुष्याणामेवादान्ता येऽन्यैरुत्तमै-<br>र्गुणैः संपन्नास्ते देवाः, लोभ-<br>प्रधाना मनुष्याः, तथा हिंसापराः<br>क्रूरा असुराः, त एव मनुष्या<br>अदान्तत्वादिदोषत्रयमपेक्ष्य<br>देवादिशब्दभाजो भवन्ति,<br>इतरांश्च गुणान् सत्त्वरजस्तमांस्य-<br>पेक्ष्य । अतो मनुष्यैरेव शिक्षि-<br>तव्यमेतत् त्रयमिति, तदपेक्षयैव<br>प्रजापतिनोपदिष्टत्वात् । तथा<br>हि मनुष्या अदान्ता लुब्धाः<br>क्रूराश्च दृश्यन्ते, तथा च स्मृतिः—<br>“कामः क्रोधस्तथा लोभस्त-<br>स्मादेतत् त्रयं त्यजेत् ।” (गीता<br>१६ । २१) इति ॥ ३ ॥अतः प्रजापतिको यह पुत्रोंको दिया<br>हुआ उपदेश उनका परम हित है।<br>इसलिये मनुष्योंको भी इन तीनों-<br>हीकी शिक्षा लेनी चाहिये ।<br><br>अथवा यों समझो कि यहां<br>मनुष्योंसे भिन्न कोई देव या असुर<br>नहीं हैं; मनुष्योंमें ही जो दमन-<br>शील नहीं हैं, किंतु अन्य उत्तम<br>गुणोंसे सम्पन्न हैं उन्हें ही देव कहा<br>है, लोभप्रधान व्यक्ति मनुष्य कहे<br>गये हैं तथा हिंसापरायण और क्रूर<br>व्यक्ति असुर हैं। वे मनुष्य ही<br>अदान्तता आदि तीन दोषोंकी<br>अपेक्षासे तथा सत्त्व, रज और तम-<br>इन अन्य गुणोंके अनुसार देवता<br>आदि नाम धारण करते हैं। अतः<br>ये तीनों साधन मनुष्योंको ही<br>सीखने चाहिये; क्योंकि उनके<br>उद्देश्यसे ही प्रजापतिने इनका<br>उपदेश किया है। तथा मनुष्य अ-<br>जितेन्द्रिय, लोभी और क्रूर प्रकृति-<br>के देखे भी जाते ही हैं, ऐसा ही<br>यह स्मृति भी कहती है—"काम,<br>क्रोध और लोभ [ ये तीन नरकके<br>द्वार हैं ] अतः इन तीनोंका त्याग<br>करना चाहिये" ॥ ३ ॥

इति बृहदारण्यकोपनिषद्भाष्ये पञ्चमाध्याये
द्वितीयं प्राजापत्यब्राह्मणम् ॥ २ ॥