बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Brihadaranyaka Upanishad with Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
DevanagariSanskritpublished1,402 पृष्ठ
पृष्ठ 1206, कुल 1402 में से
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| ११९२ | बृहदारण्यकोपनिषद् | [ अध्याय ५ |
|---|
| संस्कृत-भाष्यम् | हिन्दी-अनुवाद |
|---|---|
| तद् वैदिति हृदयं ब्रह्म परामृष्टम्, इति स्मरणार्थम्, तद् यद् हृदयं ब्रह्म स्मर्यत इत्येकस्तच्छब्दः, तदेतदुच्यते प्रकारान्तरेणेति द्वितीयस्तच्छब्दः, किं पुनस्तत् प्रकारान्तरम् ? एतदेव तदित्येतच्छब्देन संबद्धयते तृतीयस्तच्छब्दः। एतदिति वक्ष्यमाणं बुद्धौ सन्निधीकृत्याह— | तत्—'तत्' ऐसा कहकर हृदय-ब्रह्मका परामर्श किया गया है। 'वै' यह अव्यय स्मरणके लिये है। तत्--वह अर्थात् जो हृदय-ब्रह्म स्मरणका विषय हो रहा है, वह—इस भावको व्यक्त करनेके लिये प्रथम तत् शब्दका प्रयोग हुआ है। उसीका यह प्रकारान्तरसे वर्णन किया जाता है, इसलिये [ अर्थात् जिसका स्मरण होता है उसीका यह वर्णन है-इस सम्बन्धको व्यक्त करनेके लिये ] दूसरा 'तत्' शब्द दिया है। किंतु वह प्रकारान्तर क्या है ? इसी बातका [ तीसरे ] 'तत्' शब्दसे सम्बन्ध दिखाया गया है, इसीसे तीसरा 'तत्' शब्द प्रयुक्त हुआ है। फिर 'एतत्' इस शब्दसे श्रुति कही जानेवाली बातको बुद्धिमें रखकर कहती है-- |
| आस बभूव। किं पुनरेतदेवास यदुक्तं हृदयं ब्रह्मेति तदिति तृतीयस्तच्छब्दो विनियुक्तः। | 'आस'--था। किंतु वह कौन था ? यही, जिसका कि हृदय-ब्रह्म ऐसा कहकर वर्णन किया है--यह बतानेके लिये तीसरे 'तत्' शब्दका प्रयोग किया गया है। |
| किं तदिति विशेषतो निर्दिशति—‘सत्यमेव सच त्यच्च मूर्तं चामूर्तं च सत्यं ब्रह्म पञ्चभूतात्मकमित्येतत्।’ स यः कश्चित् सत्यात्मानमेतं महन्महत्त्वाद् यक्षं | वह क्या है? इसपर श्रुति उसका विशेष रूपसे निर्देश करती है--'सत्यमेव'। सत् और त्यत्--मूर्त और अमूर्त सत्य ब्रह्म ही है, अर्थात् पञ्चभूतात्मक है, जो कोई इस सत्यात्मा, महान् होनेके कारण महत्, यक्ष— |