बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Brihadaranyaka Upanishad with Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 1208, कुल 1402 में से
संदर्भ में पढ़ेंपञ्चम ब्राह्मण
प्रथमज सत्य-ब्रह्म और 'सत्य' नामके अक्षरोंकी उपासना
| सत्यस्य ब्रह्मणः स्तुत्यर्थमिदमाह, महद् यक्षं प्रथमजमित्युक्तम्, तत् कथं प्रथमजत्वम् ? इत्युच्यते— | सत्य-ब्रह्मकी स्तुतिके लिये यह ब्राह्मण उसे 'महत्, यक्ष, प्रथमज' इस प्रकार कहता है, सो पहले बतला दिया। उसका प्रथमजत्व किस प्रकार है ? सो बतलाया जाता है— |
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आप एवेदमग्र आसुरता आपः सत्यमसृजन्त सत्यं ब्रह्म प्रजापतिं प्रजापतिर्देवाँस्ते देवाः सत्यमेवोपासते तदेतत् त्र्यक्षरँसत्यमिति स इत्येकमक्षरं तीत्येकमक्षरं यमित्येकमक्षरं प्रथमोत्तमे अक्षरे सत्यं मध्यतोऽनृतं तदेतदनृतमुभयतः सत्येन परिगृहीतँ सत्यभूयमेव भवति नैवं विद्वाँसमनृतँहिनस्ति ॥१॥
यह [ व्यक्त जगत् ] पहले आप (जल) ही था। उस आपने सत्यकी रचना की। अतः सत्य ब्रह्म है। ब्रह्मने प्रजापति (विराट्) को और प्रजापतिने देवताओंको उत्पन्न किया। वे देवगण सत्यकी ही उपासना करते हैं। वह यह 'सत्य' तीन अक्षरवाला नाम है। 'स' यह एक अक्षर है, 'ती' यह एक अक्षर है और 'यम्' यह एक अक्षर है। इनमें प्रथम और अन्तिम अक्षर सत्य है और मध्यका अनृत है। वह यह अनृत दोनों ओरसे सत्यसे परिगृहीत है। इसलिये यह सत्यबहुल ही है। इस प्रकार जाननेवालेको अनृत नहीं मारता ॥ १ ॥
| आप एवेदमग्र आसुः । आप इति कर्मसमवायिन्योऽग्निहोत्राद्या- | आरम्भमें यह आप (जल) ही था। 'आप' शब्दसे कर्मसम्बन्धी अग्निहोत्र आदिकीआहुतियां कही गयी |
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