भारतकोश
बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

Brihadaranyaka Upanishad with Shankara Bhashya

आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished1,402 पृष्ठ

पृष्ठ 1209, कुल 1402 में से

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पृष्ठ 1209
ब्राह्मण ५ ]शाङ्करभाष्यार्थ११९५
शाङ्करभाष्यम्भाष्यार्थ
हुतयः, अग्निहोत्राद्याहुतेर्द्रवात्मकत्वादप्त्वम्, ताश्चापोऽग्निहोत्रादिकर्मापवर्गोत्तरकालं केनचिददृष्टेन सूक्ष्मेणात्मना कर्मसमवायित्वमपरित्यजन्त्य इतरभूतसहिता एव न केवलाः। कर्मसमवायित्वात्तु प्राधान्यमपामिति।हैं। अग्निहोत्रादिकी आहुति द्रवरूप होनेके कारण आप (जल) है। अग्निहोत्र-कर्मकी समाप्तिके पश्चात् वह आप किसी अदृष्ट सूक्ष्मरूपसे अपने कर्म-सम्बन्धको न छोड़ते हुए अन्य भूतोंके साथ ही रहता है, अकेला नहीं रहता। कर्मसम्बन्धित्व रहनेके कारण प्रधानता आप (जल) की ही है [इसलिये यहाँ उसे 'आप' शब्दसे ही कहा है।]
सर्वाण्येव भूतानि प्रागुत्पत्तेरव्याकृतावस्थानि कर्तृसहितानि निर्दिश्यन्त आप इति। ता आपो बीजभूता जगतोऽव्याकृतात्मनावस्थितास्ता एवेदं सर्वं नामरूपविकृतं जगदग्र आसुर्नान्यत् किञ्चिद् विकारजातमासीत्।यहाँ 'आप' ऐसा कहकर उत्पत्तिसे पहले अव्याकृत (अव्यक्त) रूपमें स्थित कर्तासहित सभी भूतोंका निर्देश किया जाता है। जगत्का बीजभूत वह आप अव्याकृतरूपसे स्थित था। यह नाम-रूप विकारको प्राप्त हुआ जगत् आरम्भमें वही था, उससे भिन्न कोई और विकारसमुदाय नहीं था।
ताः पुनरापः सत्यमसृजन्त; तस्मात् सत्यं ब्रह्म प्रथमजम्, तदेतद् हिरण्यगर्भस्य सूत्रात्मनो जन्म, यदव्याकृतस्य जगतो व्याकरणम्। तत् सत्यं ब्रह्म, कुतः? महत्त्वात्। कथं महत्त्वम्? इत्याह—यस्मात् सर्वस्य स्रष्टृ। कथम्? यत् सत्यं ब्रह्म तत्फिर उस आपने सत्यकी रचना की। इसीसे सत्य ब्रह्म प्रथमज है। वही यह सूत्रात्मा हिरण्यगर्भकी उत्पत्ति है; जो कि अव्याकृत जगत्का व्यक्त होना है। वह सत्य ब्रह्म है, क्यों ब्रह्म है? महत्ताके कारण। उसकी महत्ता किस प्रकार है? सो श्रुति बतलाती है—क्योंकि वह सबका स्रष्टा है। किस प्रकार? जो सत्य