बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Brihadaranyaka Upanishad with Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 1210, कुल 1402 में से
संदर्भ में पढ़ें| ११९६ | बृहदारण्यकोपनिषद् | [अध्याय ५ |
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| प्रजापतिं प्रजानां पतिं विराजं सूर्यादिकरणमसृजतेत्यनुषङ्गः । प्रजापतिर्देवान् स विराट्प्रजापतिर्देवानसृजत । यस्मात् सर्वमेवं क्रमेण सत्याद् ब्रह्मणो जातं तस्मान्महत् सत्यं ब्रह्म । | ब्रह्म था, उसने प्रजापतिको—सूर्यादि जिसकी इन्द्रियां हैं, उस प्रजाओंके स्वामी विराट्को उत्पन्न किया--ऐसा इसका सम्बन्ध है । 'प्रजापतिर्देवान्'—उस विराट् प्रजापतिने देवताओंको उत्पन्न किया । चूँकि इस क्रमसे सब कुछ सत्य ब्रह्मसे ही उत्पन्न हुआ है, इसलिये सत्य ब्रह्म महत् है । | | कथं पुनर्यक्षम् ? इत्युच्यते—<br><br>त एवं सृष्टा देवाः पितरमपि विराजमतीत्य तदेव सत्यं ब्रह्मोपासते । अत एतत् प्रथमजं महत् यक्षम् । तस्मात् सर्वात्मनोपास्यं तत्, तस्यापि सत्यस्य ब्रह्मणो नाम सत्यमिति । | किंतु वह यक्ष (पूज्य) क्यों है, सो बतलाया जाता है—वे इस प्रकार रचे हुए देवगण अपने पिता विराट्का भी अतिक्रमण करके उस सत्य-ब्रह्मकी ही उपासना करते हैं, इसलिये यह प्रथमोत्पन्न सत्य-ब्रह्म महत् यक्ष है । अतः वह सब प्रकार उपासनीय है, उस सत्य-ब्रह्मका भी 'सत्य' यह नाम है । | | तदेतत् त्र्यक्षरम् । कानि तान्यक्षराणि ? इत्याह—स इत्येकमक्षरम्, तीत्येकमक्षरम्—तीतीकारानुबन्धो निर्देशार्थः—यमित्येकमक्षरम्; तत्र तेषां प्रथमोत्तमे अक्षरे सकारयकारौ सत्यम्; मृत्युरूपाभावात् । मध्यतो | वह यह नाम तीन अक्षरोंवाला है । वे अक्षर कौन-से हैं, सो श्रुति बतलाती है--'स' यह एक अक्षर है । 'ती' यह एक अक्षर है—'ती' इसमें ईकारानुबन्ध निर्देश (स्पष्ट उच्चारण) के लिये है--'यम्' यह एक अक्षर है । इनमें सकार और यकार—ये पहले और अन्तिम अक्षर सत्य हैं, क्योंकि उनके मृत्युरूपका अभाव है । मध्यतः |