बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Brihadaranyaka Upanishad with Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 1219, कुल 1402 में से
संदर्भ में पढ़ें[ ब्राह्मण ८ ] शाङ्करभाष्यार्थ [ १२५५ ]
| कारं विदार्य ह्यवभासतेऽतो विद्युत् । एवंगुणं विद्युद् ब्रह्मेति यो वेदासाविद्यत्यवखण्डयति विनाशयति पाप्मन एनमात्मानं प्रति प्रतिकूलभूताः पाप्मानो ये तान् सर्वान् पाप्मनोऽवखण्डयतीत्यर्थः । य एवं वेद विद्युद् ब्रह्मेति तस्यानुरूपं फलम् । विद्युद्धि यस्माद् ब्रह्म ॥ १ ॥ | को विदीर्ण करके प्रकाशित होती है, इसलिये विद्युत् है । ऐसे गुणवाले विद्युद् ब्रह्मको जो जानता है, वह पापको 'विद्यति—खण्डित अर्थात् नष्ट कर देता है । तात्पर्य यह है कि इस आत्माके प्रतिकूलभूत जितने पाप होते हैं, उन सबका यह खण्डन कर देता है। जो 'विद्युत् ब्रह्म है' ऐसा जानता है, यह उसका अनुरूप फल है। क्योंकि विद्युत् ही ब्रह्म है ॥ १ ॥ |
इति बृहदारण्यकोपनिषद्भाष्ये पञ्चमाध्याये सप्तमं विद्युद्ब्राह्मणम् ॥ ७ ॥
अष्टम ब्राह्मण
धेनुरूपसे वाक् की उपासना
| पुनरुपासनान्तरं तस्यैव ब्रह्मणो वाग् वै ब्रह्मेति— | पुनः उस सत्यब्रह्मकी ही 'वाग्वै ब्रह्म' ऐसी अन्य उपासना आरम्भ की जाती है— |
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वाचं धेनुमुपासीत तस्याश्चत्वारः स्तनाः स्वाहाकारो वषट्कारो हन्तकारः स्वधाकारस्तस्यै द्वौ स्तनौ देवा उपजीवन्ति स्वाहाकारं च वषट्कारं च हन्तकारं मनुष्याः स्वधाकारं पितरस्तस्याः प्राण ऋषभो मनो वत्सः ॥ १ ॥
वाक्रूप धेनुकी उपासना करे। उसके चार स्तन हैं—स्वाहाकार, वषट्कार, हन्तकार और स्वधाकार। उसके दो स्तन स्वाहाकार और वषट्-