भारतकोश
बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

Brihadaranyaka Upanishad with Shankara Bhashya

आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished1,402 पृष्ठ

पृष्ठ 1218, कुल 1402 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 1218
१२०४बृहदारण्यकोपनिषद्[ अध्याय ५

| सर्वमिदं प्रशास्ति यदिदं किञ्च यत् किञ्चित् सर्वं जगत् तत् सर्वं प्रशास्ति। एवं मनोमयस्योपासनात् तथारूपापत्तिरेव फलम्। "तं यथा यथोपासते तदेव भवति" इति ब्राह्मणम् ॥ १ ॥ | [ फल—] इन सबका प्रशासन करता है—यह जो कुछ है अर्थात् जितना कुछ भी यह जगत् है, उन सबका प्रकर्षतया शासन करता है। इस प्रकार मनोमय ब्रह्मकी उपासनासे तद्रूपताकी प्राप्तिरूप ही फल मिलता है। "उसकी जो जिस प्रकार उपासना करता है वही हो जाता है"—ऐसा ब्राह्मणवाक्य है ॥ १ ॥ |

इति बृहदारण्यकोपनिषद्भाष्ये पञ्चमाध्याये षष्ठं मनोब्राह्मणम् ॥ ६ ॥

सप्तम ब्राह्मण

विद्युद्ब्रह्मकी उपासना

तथैवोपासनान्तरं सत्यस्य ब्रह्मणो विशिष्टफलमारभ्यते—इसी प्रकार सत्य-ब्रह्मकी विशिष्ट फलवाली एक दूसरी उपासनाका आरम्भ किया जाता है—

विद्युद् ब्रह्मेत्याहुर्विदानाद् विद्युद् विद्यत्येनं पाप्मनो य एवं वेद विद्युद् ब्रह्मेति विद्युद्ध्येव ब्रह्म ॥ १ ॥

विद्युत् ब्रह्म है—ऐसा कहते हैं। विदान (खण्डन या विनाश) करनेके कारण विद्युत् है। जो 'विद्युत् ब्रह्म है' ऐसा जानता है, वह इस आत्माके प्रतिकूलभूत पापोंका नाश कर देता है, क्योंकि विद्युत् ही ब्रह्म है ॥ १ ॥

विद्युद् ब्रह्मेत्याहुः। विद्युतो ब्रह्मणो निर्वचनमुच्यते—विदानादवखण्डनात् तमसो मेघान्ध-'विद्युद् ब्रह्मेत्याहुः'—श्रुतिविद्युत्-ब्रह्मकी निरुक्ति (व्युत्पत्ति) बतलाती है—अन्धकारके विदान-खण्डनके कारण, क्योंकि यह मेघके अन्धकार-
बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित) · पृष्ठ 1218, कुल 1402 में से · BharatKosha