बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Brihadaranyaka Upanishad with Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
DevanagariSanskritpublished1,402 पृष्ठ
पृष्ठ 1217, कुल 1402 में से
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ब्राह्मण ६ ] शाङ्करभाष्यार्थ १२०३
प्रकाश ही जिसका सत्य ( स्वरूप ) है, ऐसा यह पुरुष मनोमय है। वह उस अन्तर्हृदयमें जैसा व्रीहि ( धान ) या यव ( जौ ) होता है, उतने ही परिमाणवाला है। वह यह सबका स्वामी और सबका अधिपति है, तथा यह जो कुछ है, सभीका प्रकर्षतया शासन करता है ॥ १ ॥
| संस्कृत भाष्य | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| मनोमयो मनःप्रायो मनस्युपलभ्यमानत्वात् । मनसा चोपलभत इति मनोमयोऽयं पुरुषो भाःसत्यो भा एव सत्यं सद्भावः स्वरूपं यस्य सोऽयं भाःसत्यो भास्वर इत्येतत् । मनसः सर्वार्थविभासकत्वान्मनोमयत्वाच्चास्य भास्वरत्वम् । | मनमें उपलब्ध होनेवाला होनेसे यह मनोमय–मनःप्राय है। इसे मनसे उपलब्ध करते हैं, इसलिये यह पुरुष मनोमय है; तथा भाःसत्य है—भा ही सत्य—सद्भाव अर्थात् स्वरूप है जिसका, ऐसा यह पुरुष भाःसत्य अर्थात् भास्वर है। मनके सभी विषयोंका अवभासक तथा मनोमय होनेके कारण ही इसकी भास्वरता है। |
| तस्मिन्नन्तर्हृदये हृदयस्यान्तस्तस्मिन्नित्येतत्, यथा व्रीहिर्वा यवो वा परिमाणत एवं परिमाणस्तस्मिन्नन्तर्हृदये योगिभिर्दृश्यत इत्यर्थः । स एष सर्वस्येशानः सर्वस्य स्वभेदजातस्येशानः स्वामी । स्वामित्वेऽपि सति कश्चिदमात्यादितन्त्रोऽयं तु न तथा किं तर्ह्यधिपतिरधिष्ठाय पालयिता । | उस अन्तर्हृदयमें अर्थात् हृदय-का जो अन्तर्भाग है उसमें, जैसा कि परिमाणतः व्रीहि या यव होता है, उतने ही परिमाणवाला यह उस अन्तर्हृदयमें योगियोंद्वारा देखा जाता है—ऐसा इसका तात्पर्य है। वह यह सबका ईशान अर्थात् अपने [औपाधिक] भेदसमुदायका स्वामी है। स्वामी होनेपर भी कोई मन्त्री आदिके अधीन रहता है, किंतु यह ऐसा नहीं है। तो फिर क्या है? यह अधिपति अर्थात् अधिष्ठाता होकर पालन करनेवाला है। |