बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Brihadaranyaka Upanishad with Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 1223, कुल 1402 में से
संदर्भ में पढ़ेंदशम ब्राह्मण
प्रकरणान्तर्गत उपासनाओंसे प्राप्त होनेवाली गति
| सर्वेषामस्मिन् प्रकरण उपास-<br>नानां गतिरियं फलं चोच्यते— | इस प्रकरणमें बतलायी गयी समस्त उपासनाओंका यह गतिरूप फल बतलाया जाता है— |
यदा वै पुरुषोऽस्माल्लोकात् प्रैति स वायुमागच्छति तस्मै स तत्र विजिहीते यथा रथचक्रस्य खं तेन स ऊर्ध्व आक्रमते स आदित्यमागच्छति तस्मै स तत्र विजिहीते यथा लम्बरस्य खं तेन स ऊर्ध्व आक्रमते स चन्द्रमसमागच्छति तस्मै स तत्र विजिहीते यथा दुन्दुभेः खं तेन स ऊर्ध्व आक्रमते स लोकमागच्छत्यशोकमहिमं तस्मिन् वसति शाश्वतीः समाः ॥१॥
जिस समय यह पुरुष इस लोकसे मरकर जाता है, उस समय वह वायुको प्राप्त होता है। वहाँ वह वायु उसके लिये छिद्रयुक्त हो जाता—मार्ग दे देता है, जैसा कि रथके पहियेका छिद्र होता है। उसके द्वारा वह ऊर्ध्व होकर चढ़ता है। वह सूर्यलोकमें पहुँच जाता है। वहाँ सूर्य उसके लिये वैसा ही छिद्ररूप मार्ग देता है, जैसा कि लम्बर नामके बाजेका छिद्र होता है। उसमें होकर वह ऊपरको ओर चढ़ता है। वह चन्द्र-लोकमें पहुँच जाता है। वहाँ चन्द्रमा भी उसके लिये छिद्रयुक्त हो मार्ग देता है, जैसा कि दुन्दुभिका छिद्र होता है। उसके द्वारा वह ऊपरकी ओर चढ़ता है। वह अशोक (मानसिक दुःखसे रहित) और अहिम (शारीरिक दुःखशून्य) लोकमें पहुँच जाता है और उसमें सदा—अनन्त वर्षोंतक अर्थात् ब्रह्माके अनेक कल्पोंतक निवास करता है ॥१॥