बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Brihadaranyaka Upanishad with Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 1225, कुल 1402 में से
संदर्भ में पढ़ें| ब्राह्मण ११ ] | शाङ्करभाष्यार्थ | १२११ |
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| सोऽपि तस्मै तत्र विजिहीते, यथा दुन्दुभेः खं प्रसिद्धम्, तेन स ऊर्ध्व आक्रमते । स लोकं प्रजापतिलोकमागच्छति; किंविशिष्टम् ? अशोकं मानसेन दुःखेन विवर्जितमित्येतत्; अहिमं हिमवर्जितं शारीरदुःखवर्जितमित्यर्थः; तं प्राप्य तस्मिन् वसति शाश्वतीर्नित्याः समाः संवत्सरानित्यर्थः । ब्रह्मणो बहून् कल्पान् वसतीत्येतत् ॥ १ ॥ | वहां वह भी उसके लिये अपने-को छिद्रयुक्त कर देता है, जैसा कि दुन्दुभिका छिद्र प्रसिद्ध है, उसके द्वारा वह ऊपरकी ओर चढ़ता है । वह लोक अर्थात् प्रजापतिलोकमें आ जाता है; कैसे लोकमें ? 'अशोकम्' अर्थात् मानसिक दुःखसे रहित और 'अहिमम्'—हिमवर्जित अर्थात् शारीरिक दुःखसे रहित लोकमें । वहाँ पहुँचकर वह उसमें 'शाश्वतीः समाः'—नित्य अर्थात् अनन्त वर्षोंतक बसता है । तात्पर्य यह कि ब्रह्माके अनेकों कल्पोंतक वहाँ निवास करता है ॥ १ ॥ |
इति बृहदारण्यकोपनिषद्भाष्ये पञ्चमाध्याये
दशमं गतिब्राह्मणम् ॥ १० ॥
एकादश ब्राह्मण
व्याधि, श्मशानगमन और अग्निदाहमें परम तपोहृष्टिका विधान
एतद्वै परमं तपो यद् व्याहितस्तप्यते परमँ० हैव लोकं जयति य एवं वेदैतद्वै परमं तपो यं प्रेतमरण्यँ० हरन्ति परमँ० हैव लोकं जयति य एवं वेदैतद्वै परमं तपो यं प्रेतमग्नावभ्यादधति परम ँ० हैव लोकं जयति य एवं वेद ॥ १ ॥