बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Brihadaranyaka Upanishad with Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 1228, कुल 1402 में से
संदर्भ में पढ़ें| १२१४ | बृहदारण्यकोपनिषद् | [अध्याय ५ |
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कुर्यामिति स ह स्माह पाणिना मा प्रातृद कस्त्वेनयोरे- कधाभूयं भूत्वा परमतां गच्छतीति तस्मा उ हैतदुवाच वीत्यन्नं वै व्यन्ने हीमानि सर्वाणि भूतानि विष्टानि रमिति प्राणो वै रं प्राणे हीमानि सर्वाणि भूतानि रमन्ते सर्वाणि ह वा अस्मिन् भूतानि विशन्ति सर्वाणि भूतानि रमन्ते य एवं वेद ॥ १ ॥
कोई कहते हैं कि अन्न ब्रह्म है; किंतु ऐसी बात नहीं है; क्योंकि प्राणके बिना अन्न सड़ जाता है। कोई कहते हैं-प्राण ब्रह्म है; किंतु ऐसी बात नहीं है, क्योंकि अन्नके बिना प्राण सूख जाता है। परंतु ये दोनों देव एकरूपताको प्राप्त होकर परम भावको प्राप्त होते हैं—ऐसा निश्चय कर प्रातृद ऋषिने अपने पितासे कहा था—‘इस प्रकार जाननेवाले-का मैं क्या शुभ करूँ अथवा क्या अशुभ करूँ ? [ क्योंकि कृतकृत्य हो जानेके कारण उसका तो न कोई शुभ किया जा सकता है और न अशुभ ही ।]’ पिताने हाथसे निवारण करते हुए कहा—‘प्रातृद ! ऐसा मत कहो। इन दोनोंकी एकरूपताको प्राप्त होकर कौन परमताको प्राप्त होता है ?’ अतः उससे उस (प्रातृदके पिता) ने ‘वि’ ऐसा कहा। ‘वि’ यही अन्न है। वि-रूप अन्नमें ही ये सब भूत प्रविष्ट हैं। ‘रम्’ यह प्राण है, क्योंकि रं अर्थात् प्राणमें ही ये सब भूत रमण करते हैं। जो ऐसा जानता है, उसमें ये सब भत प्रविष्ट होते हैं और सभी भूत रमण करते हैं ॥ १ ॥
| अन्नं ब्रह्मान्नमद्यते यत् तद् ब्रह्मेत्येक आचार्या आहुस्तन्न तथा ग्रहीतव्यमन्नं ब्रह्मेति । अन्ये चाहुः—प्राणो ब्रह्मेति, तच्च तथा न ग्रहीतव्यम् । | अन्न ब्रह्म है। अन्न जो कि खाया जाता है, वह ब्रह्म है—ऐसा किन्हीं आचार्योंका कथन है; किंतु ‘अन्न ब्रह्म है’ इसे इसी रूपमें नहीं स्वीकार करना चाहिये। दूसरे कहते हैं—प्राण ब्रह्म है; इसे भी इस रूपमें नहीं स्वीकार करना चाहिये। |