बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Brihadaranyaka Upanishad with Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 1236, कुल 1402 में से
संदर्भ में पढ़ें| १२२२ | बृहदारण्यकोपनिषद् | [ अध्याय ५ |
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| भवतीत्यर्थः। क्षत्रस्य सायुज्यं सलोकतां जयति य एवं वेद ॥ ४ ॥ | हो जाता है—ऐसा अर्थ होगा। जो इस प्रकार उपासना करता है, वह क्षत्रके सायुज्य और सलोकताको प्राप्त होता है ॥ ४ ॥ |
इति बृहदारण्यकोपनिषद्भाष्ये पञ्चमाध्याये त्रयोदशमुक्थब्राह्मणम् ॥ १३ ॥
चतुर्दश ब्राह्मण
गायत्र्युपासना
| ब्रह्मणे हृदयाद्यनेकोपाधिविशिष्टस्योपासनमुक्तम्। अथेदानीं गायत्र्युपाधिविशिष्टस्योपासनं वक्तव्यम्, इत्यारभ्यते। सर्वच्छन्दसां हि गायत्रीछन्दः प्रधानभूतम्, तत्प्रयोक्तृगयत्राणाद् गायत्रीति वक्ष्यति। न चान्येषां छन्दसां प्रयोक्तृप्राणत्राणसामर्थ्यम्; प्राणात्मभूता च सा सर्वच्छन्दसां चात्मा प्राणः। प्राणश्च क्षतत्राणात् क्षत्रमित्युक्तम्; प्राणश्च गायत्री; तस्मात् तदुपासनमेव विधित्स्यते। | हृदय आदि अनेक उपाधियोंसे विशिष्ट ब्रह्मकी उपासना बतलायी गयी। अब आगे गायत्रीरूप उपाधिसे विशिष्ट ब्रह्मकी उपासना बतलानी है; इसलिये प्रकरणका आरम्भ किया जाता है। सम्पूर्ण छन्दोंमें गायत्री छन्द ही प्रधानभूत है। उसका प्रयोग करनेवालेके गयका त्राण करनेके कारण यह गायत्री है—ऐसा श्रुति बतलावेगी। अन्य छन्दोंमें अपने प्रयोक्ताके प्राणोंकी रक्षा करनेका सामर्थ्य नहीं है। किंतु वह प्राणकी स्वरूपभूता है और प्राण सम्पूर्ण छन्दोंका आत्मा है। तथा क्षतसे त्राण करनेके कारण प्राण क्षत्र है—ऐसा ऊपर कहा जा चुका है। प्राण ही गायत्री है, इसलिये उसीकी उपासनाका विधान करना अभीष्ट है। |