बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Brihadaranyaka Upanishad with Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 1237, कुल 1402 में से
संदर्भ में पढ़ेंब्राह्मण १४ ] शाङ्करभाष्यार्थ [ १२२३
| द्विजोत्तमजन्महेतुत्वाच्च—<br>“गायत्र्या ब्राह्मणमसृजत त्रिष्टुभा राजन्यं जगत्या वैश्यम्” इति द्विजोत्तमस्य द्वितीयं जन्म गायत्रीनिमित्तम्। तस्मात् प्रधाना गायत्री। ‘ब्राह्मणा व्युत्थाय’ ‘ब्राह्मणा अभिवदन्ति’ ‘स ब्राह्मणो विपापो विरजोऽविचिकित्सो ब्राह्मणो भवति’ इत्युत्तमपुरुषार्थसम्बन्धं ब्राह्मणस्य दर्शयति। तच्च ब्राह्मणत्वं गायत्रीजन्ममूलमतो वक्तव्यं गायत्र्याः सततत्त्वम्। गायत्र्या हि यः सृष्टो द्विजोत्तमो निरङ्कुश एवोत्तमपुरुषार्थसाधनेऽधिक्रियते, अतस्तन्मूलः परमपुरुषार्थसम्बन्धः। तस्मात्तदुपासनविधानायाह— | इसके सिवा ब्राह्मणोंके जन्मका हेतु होनेसे भी [इसका विधान किया जाता है]। “गायत्रीसे ब्राह्मणकी रचना की, त्रिष्टुप् से क्षत्रियकी और जगतीसे वैश्यकी” इस श्रुतिके अनुसार द्विजोत्तमका द्वितीय जन्म गायत्रीके कारण है। इसलिये गायत्री प्रधान है। ‘ब्राह्मण व्युत्थान करके [भिक्षाचर्या करते हैं]’, ‘ब्राह्मण अभिवादन करते हैं’, ‘वह ब्राह्मण निष्पाप, निर्दोष और निःशङ्क ब्राह्मण होता है’ इत्यादि श्रुतियाँ ब्राह्मणका उत्तम पुरुषार्थसे सम्बन्ध प्रदर्शित करती हैं। और वह ब्राह्मणत्व गायत्रीजन्ममूलक है; इसलिये गायत्रीका तत्त्व बतलाना आवश्यक है। जो गायत्रीद्वारा रचा हुआ निरङ्कुश द्विजश्रेष्ठ है, उसीका उत्तम पुरुषार्थसाधनमें अधिकार है। अतः परमपुरुषार्थका सम्बन्ध गायत्रीमूलक है। इसलिये उसकी उपासनाका विधान करनेके लिये श्रुति कहती है— |
गायत्रीके प्रथम लोकरूप पादकी उपासना
भूमिरन्तरिक्षं द्यौरित्यष्टावक्षराण्यष्टाक्षरँ ह वा एकं गायत्र्यै पदमेतदु हैवास्या एतत् स यावदेषु त्रिषु लोकेषु तावद्ध जयति योऽस्या एतदेवं पदं वेद ॥१॥