भारतकोश
बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

Brihadaranyaka Upanishad with Shankara Bhashya

आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished1,402 पृष्ठ

पृष्ठ 1238, कुल 1402 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 1238

१२२४ | बृहदारण्यकोपनिषद् | [अध्याय ५]


भूमि, अन्तरिक्ष और द्यौ—ये आठ अक्षर हैं। आठ अक्षरवाला ही गायत्रीका एक (प्रथम) पाद है। यह (भूमि आदि) ही इस गायत्रीका प्रथम पाद है। इस प्रकार इसके इस पदको जो जानता है, वह इस त्रिलोकीमें जितना कुछ है, उस सबको जीत लेता है॥ १॥

संस्कृत-भाष्यहिन्दी-अनुवाद
भूमिरन्तरिक्षं द्यौरित्येतान्यष्टावक्षराणि, अष्टाक्षरमष्टावक्षराणि यस्य तदिदमष्टाक्षरम्; ह वै प्रसिद्धावद्योतकौ, एकं प्रथमं गायत्र्यै गायत्र्याः पदम्, यकारेणैवाष्टत्वपूरणम्, एतदु हैवैकदे-वास्या गायत्र्याः पदं पादः प्रथमो भूम्यादिलक्षणस्त्रैलोक्यात्मा; अष्टाक्षरत्वसामान्यात्।<br><br>एवमेतत् त्रैलोक्यात्मकं गायत्र्याः प्रथमं पदं यो वेद तस्यैतत् फलम्—स विद्वान् यावत् किञ्चिदेषु त्रिषु लोकेषु जेतव्यं तावत् सर्वं ह जयति योऽस्या एतदेवं पदं वेद ॥ १ ॥भूमि, अन्तरिक्ष, द्यौः—इस प्रकार ये आठ अक्षर हैं। गायत्री का एक अर्थात् प्रथम पाद अष्टाक्षर—जिसमें आठ अक्षर हों, ऐसा यह अष्टाक्षर है। ह और वै—ये प्रसिद्धि-के सूचक निपात हैं। 'द्यौः' इसके यकारसे ही आठ संख्याकी पूर्ति होती है; यही इस गायत्रीका भूमि आदि लक्षणोंवाला त्रिलोकरूप प्रथम पाद है, क्योंकि आठ अक्षर होनेमें इनकी समानता है।<br><br>इस प्रकार गायत्रीके इस त्रैलोक्यात्मक प्रथम पादको जो जानता है, उसे यह फल प्राप्त होता है। वह उपासक, जो इस प्रकार इसके इस पादको जानता है, इस त्रिलोकीमें जो कुछ जय करने योग्य है, उस सभीको जीत लेता है ॥१॥

गायत्रीके द्वितीय त्रयीरूप पादकी उपासना

तथा—इसी प्रकार—

ऋचो यजूंषि सामानीत्यष्टावक्षराण्यष्टाक्षरँ ह वा एकं गायत्र्यै पदमेतदु हैवास्या एतत् स यावतीयं त्रयी विद्या तावच्छ जयति योऽस्या एतदेवं पदं वेद ॥ २ ॥