भारतकोश
बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

Brihadaranyaka Upanishad with Shankara Bhashya

आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished1,402 पृष्ठ

पृष्ठ 1239, कुल 1402 में से

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पृष्ठ 1239

ब्राह्मण १४ ] शाङ्करभाष्यार्थ १२२५


‘ऋचः, यजूंषि, सामानि’ ये आठ अक्षर हैं। आठ अक्षरवाला ही गायत्रीका एक (द्वितीय) पाद है। यह (ऋक् आदि) ही इस गायत्रीका द्वितीय पाद है। जो इस प्रकार इसके इस पादको जानता है, वह जितनी यह त्रयीविद्या है [अर्थात् त्रयीविद्याका जितना फल है] उस सभीको जीत लेता है ॥ २ ॥

| ऋचो यजूंषि सामानीति त्रयीविद्यानामक्षराणि, एतान्यप्यष्टावेव; तथैवाष्टाक्षरं ह वा एकं गायत्र्यै पदं द्वितीयम् एतदु हैवास्या एतद् ऋग्यजुःसामलक्षणमष्टाक्षरत्वसामान्यादेव । स यावतीयं त्रयीविद्या त्रय्या विद्यया यावत् फलजातमाप्यते तावद्ध जयति योऽस्या एतद् गायत्र्यास्त्रैविद्यलक्षणं पदं वेद ॥ २ ॥ | ‘ऋचः, यजूंषि, सामानि’ ये त्रयीविद्याके अक्षर हैं। ये भी आठ ही हैं; इसी प्रकार गायत्रीका एक अर्थात् द्वितीय पद भी आठ अक्षरोंवाला है। अष्टाक्षरत्वमें समानता होनेके कारण ही यह ऋग्यजुःसामरूप गायत्रीका द्वितीय पाद है। जो इस गायत्रीके इस त्रैविद्य (तीनों वेद) रूप पदको जानता है, वह जितनी यह त्रयीविद्या है अर्थात् त्रयीविद्यासे जितना फल प्राप्त किया जाता है, वह सब जीत लेता है ॥ २ ॥ |


गायत्रीके तृतीय प्राणादिपाद और तुरीय दर्शत परोरजापादकी उपासना

तथा—तथा—

प्राणोऽपानो व्यान इत्यष्टावक्षराण्यष्टाक्षरँ ह वा एकं गायत्र्यै पदमेतदु हैवास्या एतत् स यावदिदं प्राणि तावद्ध जयति योऽस्या एतदेवं पदं वेदाथास्य एतदेव तुरीयं दर्शतं पदं परोरजा य एष तपति यद् वै चतुर्थं तत् तुरीयं दर्शतं पदमिति ददृश इव ह्येष परोरजा इति