भारतकोश
बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

Brihadaranyaka Upanishad with Shankara Bhashya

आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished1,402 पृष्ठ

पृष्ठ 1240, कुल 1402 में से

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पृष्ठ 1240

१२२६ बृहदारण्यकोपनिषद् [ अध्याय ५

सर्वमु ह्येवैष रज उपर्युपरि तपत्येवँहैव श्रिया यशसा तपति योऽस्या एतदेवं पदं वेद ॥ ३ ॥

प्राण, अपान, व्यान—ये आठ अक्षर हैं। आठ अक्षरवाला ही गायत्रीका एक (तृतीय) पाद है। यह प्राणादि ही इस गायत्रीका 'तृतीय' पाद है। जो गायत्रीके इस पदको इस प्रकार जानता है, वह जितना यह प्राणिसमुदाय है, सबको जीत लेता है। और यह जो तपता (प्रकाशित होता) है वही इसका तुरीय, दर्शत एवं परोरजा पद है। जो चतुर्थ होता है, वही 'तुरीय' कहलाता है। 'दर्शतं पदम्' इसका अर्थ है—मानों [ यह आदित्यमण्डलस्थ पुरुष ] दीखता है, 'परोरजाः' इसका अर्थ है—यह सभी रज [ यानी लोकों ] के ऊपर-ऊपर रहकर प्रकाशित होता है। जो गायत्रीके इस चतुर्थ पदको इस प्रकार जानता है, वह इसी प्रकार शोभा और कीर्तिसे प्रकाशित होता है ॥ ३ ॥

| प्राणोऽपानो व्यान एतान्यपि प्राणाद्यभिधानाक्षराण्यष्टौ। तच्च गायत्र्यास्तृतीयं पदं यावदिदं प्राणिजातं तावद्व जयति योऽस्या एतदेवं गायत्र्यास्तृतीयं पदं वेद। | प्राण, अपान, व्यान—ये प्राणादिके नाम भी आठ ही अक्षर हैं। यह गायत्रीका तृतीय पाद है। जो इस प्रकार गायत्रीके इस तृतीय पदको जानता है, वह यह जितना प्राणिसमूह है, उस सभीको जीत लेता है। | | अथानन्तरं गायत्र्यास्त्रिपदायाः शब्दात्मिकायास्तुरीयं पदमुच्यतेऽभिधेयभूतमस्याः प्रकृताया गायत्र्या एतदेव वक्ष्यमाणं तुरीयं दर्शतं पदं परोरजा य एष तपति तुरीयमित्यादिवाक्यपदार्थं स्वयमेव व्याचष्टे श्रुतिः— | अब आगे शब्दात्मिका त्रिपदा गायत्रीका अभिधेयभूत चतुर्थ पद बतलाया जाता है। यह जो तपता है, वही इस प्रकृत गायत्रीका आगे बतलाया जानेवाला तुरीय दर्शत परोरजा पद है। 'तुरीयम्' इत्यादि वाक्यके पदोंके अर्थकी श्रुति स्वयं ही व्याख्या करती है। |

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