भारतकोश
बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

Brihadaranyaka Upanishad with Shankara Bhashya

आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished1,402 पृष्ठ

पृष्ठ 1241, कुल 1402 में से

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पृष्ठ 1241
ब्राह्मण १४ ]शाङ्करभाष्यार्थ१२२७
संस्कृतहिन्दी
यद् वै चतुर्थं प्रसिद्धं लोके तदिदं तुरीयशब्देनाभिधीयते । दर्शतं पदमित्यस्य कोऽर्थः ? इत्युच्यते—ददृश इव दृश्यत इव ह्येष मण्डलान्तर्गतः पुरुषोऽतो दर्शतं पदमुच्यते । परोरजा इत्यस्य पदस्य कोऽर्थः ? इत्युच्यते—सर्वं समस्तमुह्येवैष मण्डलस्थः पुरुषो रजो रजोजातं समस्तं लोकमित्यर्थः, उपर्युपर्याधिपत्यभावेन सर्वं लोकं रजोजातं तपति । उपर्युपरीति वीप्सा सर्वलोकाधिपत्यख्यापनार्था ।<br><br>ननु सर्वशब्देनैव सिद्धत्वाद् वीप्सानर्थिका ।<br><br>नैष दोषः; येषामुपरिष्टात् सविता दृश्यते तद्विषय एव सर्वशब्दः स्यादित्याशङ्कानिवृत्त्यर्था वीप्सा । “ये चामुष्मात् पराञ्चो लोकास्तेषां चेष्टे देवकामानां च” (छा० उ० १ । ६ । ८) इति श्रुत्यन्तरात् । तस्मात् सर्वावरोधार्था वीप्सा ।लोकमें जो चतुर्थ प्रसिद्ध है, वही यह 'तुरीय' शब्दसे कहा गया है । 'दर्शतं पदम्' इसका क्या अर्थ है, सो बतलाया जाता है—यह मण्डलान्तर्गत पुरुष 'ददृश इव' अर्थात् दीखता-सा है, इसलिये यह 'दर्शत पद' कहा जाता है । 'परोरजाः' इस पदका क्या अर्थ है ? सो बतलाते हैं—यह मण्डलस्थ पुरुष समस्त रजः-रजःसमूह अर्थात् सारे ही लोकको ऊपर-ऊपर आधिपत्य-भावसे सम्पूर्ण लोकरूप रजःसमूहको प्रकाशित करता है । 'उपरि-उपरि' यह द्विरुक्ति उसका समस्त लोकपर आधिपत्य प्रकट करनेके लिये है ।<br><br>**आक्षेप—**किंतु आधिपत्य तो 'सर्व' शब्दसे ही सिद्ध हो जाता है--ऐसी स्थितिमें द्विरुक्ति तो व्यर्थ ही है ।<br><br>**उत्तर—**यह दोष नहीं है, क्योंकि जिनके ऊपर सूर्य दिखायी देता है, सर्वशब्द तो उन्हींके विषयमें होगा--इस आशङ्काकी निवृत्तिके लिये द्विरुक्ति की गयी है । यह बात “जो कि इससे ऊपरके लोक हैं, यह आदित्यमण्डलस्थ पुरुष उनका और देवताओंके अभीष्ट फलोंका भी स्वामी है” इस अन्य श्रुतिसे सिद्ध होती है । अतः सभी लोकोंका अवरोध करनेके लिये यह द्विरुक्ति है ।
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