बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Brihadaranyaka Upanishad with Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 1242, कुल 1402 में से
संदर्भ में पढ़ें| १२२८ | बृहदारण्यकोपनिषद् | [ अध्याय ५ |
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| यथासौ सविता सर्वाधिपत्य-<br>लक्षणया श्रिया यशसा च ख्या-<br>त्या तप्त्येवं हैव श्रिया यशसा<br>च तपति योऽस्या एतदेवं<br>तुरीयं दर्शतं पदं वेद ॥ ३ ॥ | जो गायत्रीके इस चतुर्थ दर्शत पदको इस प्रकार जानता है, वह इसी प्रकार श्री और कीर्तिसे प्रकाशित होता है जैसे कि यह आदित्य सर्वाधिपत्यरूपा श्री और कीर्तिसे तप रहा है ॥ ३ ॥ |
गायत्रीकी परम प्रतिष्ठा प्राण हैं, ‘गायत्री’ शब्दका निर्वचन और वटुको किये गये गायत्र्युपदेशका फल
सैषा गायत्र्येतस्मिँस्तुरीये दर्शते पदे परोरजसि प्रतिष्ठिता तद् वै तत् सत्ये प्रतिष्ठितं चक्षुर्वै सत्यं चक्षुर्हि वै सत्यं तस्माद् यदिदानीं द्वौ विवदमानावियातामहमदर्शमहमश्रौषमिति य एवं ब्रूयादहमदर्शमिति तस्मा एव श्रद्दध्याम तद् वै तत् सत्यं बले प्रतिष्ठितं प्राणो वै बलं तत् प्राणे प्रतिष्ठितं तस्मादाहुर्बलँ सत्यादोगीय इत्येवंवैषा गायत्र्यध्यात्मं प्रतिष्ठिता सा हैषा गयाँस्तत्रे प्राणा वै गयास्तत्प्राणाँस्तत्रे तद् यद् गयाँस्तत्रे तस्माद् गायत्री नाम स यामेवामूँ सावित्रीमन्वाहैवैष सा स यस्मा अन्वाह तस्य प्राणाँस्त्रायते ॥ ४ ॥
वह यह गायत्री इस चतुर्थ दर्शत परोरजा पदमें प्रतिष्ठित है। वह पद सत्यमें प्रतिष्ठित है। चक्षु ही सत्य है, चक्षु ही सत्य है—यह प्रसिद्ध है। इसीसे यदि दो पुरुष 'मैंने देखा है' 'मैंने सुना है' इस प्रकार विवाद करते हुए आवें, तो उनमेंसे जो यह कहता होगा कि 'मैंने देखा है' उसीका हमें