बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Brihadaranyaka Upanishad with Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
DevanagariSanskritpublished1,402 पृष्ठ
पृष्ठ 1243, कुल 1402 में से
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ब्राह्मण १४ ] शाङ्करभाष्यार्थे १२२९
विश्वास होगा। वह तुरीय पादका आश्रयभूत सत्य बलमें प्रतिष्ठित है। प्राण ही बल है, वह सत्य प्राणमें प्रतिष्ठित है। इसीसे कहते हैं कि सत्यकी अपेक्षा बल ओजस्वी है। इस प्रकार यह गायत्री अध्यात्म प्राणमें प्रतिष्ठित है। उस इस गायत्रीने गयोंका त्राण किया था। प्राण ही गय हैं, उन प्राणोंका इसने त्राण किया। इसने गयोंका त्राण किया था, इसीसे इसका 'गायत्री' नाम हुआ। आचार्यने आठ वर्षके वटुके प्रति उपनयनके समय जिस सावित्रीका उपदेश किया था, वह यही है। वह जिस-जिस वटुको इसका उपदेश करता है, यह उसके-उसके प्राणोंकी रक्षा करती है ॥ ४ ॥
| संस्कृत भाष्य | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| सैषा त्रिपदोक्ता या त्रैलोक्य-त्रैविद्यप्राणलक्षणा गायत्र्येतस्मिंश्चतुर्थे तुरीये दर्शते पदे परोरजसि प्रतिष्ठिता, मूर्त्तामूर्त्तरसत्वादादित्यस्य; रसापाये हि वस्तु नीरसमप्रतिष्ठितं भवति; यथा काष्ठादि दग्धसारं तद्वत्। तथा मूर्त्तामूर्त्तात्मकं जगत् त्रिपदा गायत्र्यादित्ये प्रतिष्ठिता तद्रसत्वात् सह त्रिभिः पादैः। | पूर्वोक्त तीन पदोंवाली वह यह त्रैलोक्य, त्रैविद्य और प्राणरूपा गायत्री इस चतुर्थ तुरीय दर्शत परोरजा पदमें प्रतिष्ठित है। [ यह मूर्तामूर्तरूप गायत्री चतुर्थ पदरूप आदित्यमें प्रतिष्ठित है ] क्योंकि आदित्य मूर्तामूर्तरसस्वरूप है। रस न रहनेपर तो वस्तु नीरस और अप्रतिष्ठित हो जाती है; जिस प्रकार जिसका सार दग्ध हो गया है, वह काष्ठादि नीरस हो जाता है, उसी प्रकार यहाँ भी समझना चाहिये। इस प्रकार मूर्तामूर्तात्मक जगद्रूपा त्रिपदा गायत्री तीनों पादोंके सहित आदित्यमें प्रतिष्ठित है; क्योंकि आदित्य उस ( जगत् ) का सार है। |
| तद् वै तुरीयं पदं सत्ये प्रतिष्ठितम्। किं पुनस्तत् सत्यम् ? इत्युच्यते—चक्षुर्वै सत्यम्। कथं | वह तुरीय पद सत्यमें प्रतिष्ठित है। वह सत्य क्या है ? सो बतलाया जाता है—चक्षु ही सत्य है। किस |