भारतकोश
बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

Brihadaranyaka Upanishad with Shankara Bhashya

आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished1,402 पृष्ठ

पृष्ठ 1246, कुल 1402 में से

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पृष्ठ 1246
१२३२बृहदारण्यकोपनिषद्[ अध्याय ५

| गयांस्तत्रे तस्माद् गायत्री नाम ।<br><br>गयत्राणाद् गायत्रीति प्रथिता ।<br><br>स आचार्य उपनीय माणवकम्<br>अष्टवर्षं यामेवामूं गायत्रीं<br>सावित्रीं सवितृदेवताकामन्वाह<br>पच्छोऽर्धर्चशः समस्तां च; एषैव<br>सा साक्षात्प्राणो जगत आत्मा<br>माणवकाय समर्पितेहेदानीं<br>व्याख्याता नान्या । स आचार्यो<br>यस्मै माणवकायान्वाहानुवक्ति<br>तस्य माणवकस्य गयान् प्राणां-<br>स्त्रायते नरकादिपतनात् ॥ ४ ॥ | गयोंका त्राण किया था; इसलिये इसका नाम गायत्री है। गयोंका त्राण करनेके कारण यह 'गायत्री' इस प्रकार प्रसिद्ध हुई।<br><br>उस आचार्यने आठ वर्षके वटुका उपनयन कर उसे जिस सविता देवतासम्बन्धिनी सावित्री-का पहले पदशः फिर आधो-आधी ऋचा करके और फिर सम्पूर्णरूप-से उपदेश किया था वह साक्षात् प्राण जगत्की आत्मा यह गायत्री ही उस वटुको समर्पण की गयी थी, जिसकी कि इस समय व्याख्या की गयी है, कोई और नहीं। वह आचार्य जिस वटुको उसका उपदेश करता है, उस वटुके गय यानी प्राणोंकी वह गायत्री नरकादिमें गिरनेसे रक्षा करती है ॥ ४ ॥ |


अनुष्टुप् सावित्रीके उपदेशका निषेध और गायत्री-सावित्रीका महत्त्व

ताँ हँतामेके सावित्रीमनुष्टुभमन्वाहुर्वागनुष्टुबेतद्वाचमनुब्रूम इति न तथा कुर्याद् गायत्रीमेव सावित्रीमनुब्रूयाद् यदि ह वा अप्येवं विद् बह्विव प्रतिगृह्णाति न हैव तद् गायत्र्या एकंचन पदं प्रति ॥ ५ ॥

कोई शाखावाले उस इस अनुष्टुप् छन्दवाली सावित्रीका उपदेश करते हैं।

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