बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Brihadaranyaka Upanishad with Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 1247, कुल 1402 में से
संदर्भ में पढ़ेंब्राह्मण १४] शाङ्करभाष्यार्थ १२३३
[गायत्री छन्दवाली सावित्रीका उपदेश न करके अनुष्टुप्छन्दकी सावित्री-का उपदेश करते हैं।] वे कहते हैं कि वाक् अनुष्टुप् है, इसलिये हम वाक्का ही उपदेश करते हैं। किंतु ऐसा नहीं करना चाहिये। गायत्री छन्दवाली सावित्रीका ही उपदेश करे। ऐसा जाननेवाला जो अधिक प्रतिग्रह भी करे, तो भी वह गायत्रीके एक पदके बराबर भी नहीं हो सकता ॥ ५ ॥
| तामेतां सावित्रीं हैके शाखिनोऽनुष्टुभमनुष्टुप्प्रभवामनुष्टुप्छन्दस्कान्वाहुरुपनीताय । तदभिप्रायमाह—वागनुष्टुप् । वाक् च शरीरे सरस्वती, तामेव हि वाचं सरस्वतीं माणवकायानुब्रूम इत्येतद् वदन्तः । | कोई शाखावाले उपनीत वटुको अनुष्टुप्-अनुष्टुप्प्रभव अर्थात् अनुष्टुप् छन्दवाली उस इस सावित्रीका उपदेश करते हैं। श्रुति उनका अभिप्राय बतलाती है—वाक् अनुष्टुप् है। वाक् ही शरीरमें सरस्वती है, उस वाग्रूपा सरस्वतीका ही हम माणवक (वटु) को उपदेश करते हैं-ऐसा कहते हुए वे उसका उपदेश करते हैं। | | न तथा कुर्यान्न तथा विद्याद् यत्त आहुर्मृषैव तत् । किं तर्हि ? गायत्रीमेव सावित्रीमनुब्रूयात् । कस्मात् ? यस्मात् प्राणो गायत्रीत्युक्तम् । प्राण उक्त वाक् च सरस्वती चान्ये च प्राणाः सर्वं माणवकाय समर्पितं भवति । | किंतु ऐसा नहीं करना चाहिये, ऐसा नहीं समझना चाहिये; वे जो कहते हैं, वह मिथ्या ही है। तो फिर क्या करना चाहिये ? गायत्रीछन्दवाली सावित्रीका ही उपदेश करे। क्यों ? क्योंकि प्राण गायत्री है—ऐसा कहा जा चुका है। प्राणका उपदेश हो जानेपर वाक् सरस्वती और अन्य सब प्राण भी वटुको समर्पित हो जाते हैं। |
१. अनुष्टुप् छन्द चार पादोंका होता है और गायत्री छन्द तीन पादोंका। दोनोंके पाद आठ-आठ अक्षरके ही होते हैं। अनुष्टुप् छन्दमें जो मन्त्र उपलब्ध होता है, उसका भी देवता सविता ही है, इसलिये कुछ लोग उसे ही सावित्री कहते हैं। अनुष्टुप् छन्दवाला मन्त्र इस प्रकार है—
तत्सविर्तुर्वृणीमहे वयं देवस्य भोजनम् । श्रेष्ठं सर्वधातमं तुरं भगस्य धीमहि ॥ इति
बृ० उ० ७८—