बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Brihadaranyaka Upanishad with Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 1248, कुल 1402 में से
संदर्भ में पढ़ें१२३४ | बृहदारण्यकोपनिषद् | [ अध्याय ५
| किञ्चेदं प्रासङ्गिकमुक्त्वा गायत्रीविदं स्तौति—यदि ह वा अप्येवंविद् बह्विव—न वि तस्य सर्वात्मनो बहु नामास्ति किंचित् सर्वात्मकत्वाद् विदुषः—प्रतिगृह्णाति, न हैव तत् प्रतिग्रहजातं गायत्र्या एकंचनैकमपि पदं प्रति पर्याप्तम् ॥ ५ ॥ | गायत्रीछन्दवाली सावित्रीके विषयमें यह प्रासङ्गिक बात कहकर अब श्रुति गायत्र्युपासककी स्तुति करती है—यदि इस प्रकार जाननेवाला अधिक प्रतिग्रह भी करे—'अधिक' इसलिये कहा कि सर्वात्मक होनेके कारण उस विद्वान्के लिये वास्तवमें बहुत कुछ भी नहीं है; तो भी वह प्रतिग्रह-समुदाय गायत्रीके एक पादके लिये भी पर्याप्त नहीं है ॥ ५ ॥ |
गायत्रीके प्रत्येक पदके महत्त्वका दिग्दर्शन
स य इमांँस्त्रींल्लोकान् पूर्णान् प्रतिगृह्णीयात् सोऽस्या एतत् प्रथमं पदमाप्नुयादथ यावतीयं त्रयीविद्या यस्तावत् प्रतिगृह्णीयात् सोऽस्या एतद् द्वितीयं पदमाप्नुयादथ यावदिदं प्राणि यस्तावत् प्रतिगृह्णीयात् सोऽस्या एतत्तृतीयं पदमाप्नुयादथास्या एतदेव तुरीयं दर्शतं पदं परोरजा य एष तपति नैव केनचनाप्यं कुत उ एतावत् प्रतिगृह्णीयात् ॥ ६ ॥
जो इन तीन पूर्ण लोकोंका प्रतिग्रह करता है, उसका वह (प्रतिग्रह) इस गायत्रीके इस प्रथम पादको व्याप्त करता है और जितनी यह त्रयी-विद्या है, उसका जो प्रतिग्रह करता है, वह (प्रतिग्रह) इसके इस द्वितीय पादको व्याप्त करता है और जितने ये प्राणी हैं, उनका जो प्रतिग्रह करता है, वह (प्रतिग्रह) इसके इस तृतीय पदको व्याप्त करता है और यही इसका तुरीय दर्शत परोरजा पद है, जो कि यह तपता है, यह किसीके द्वारा प्राप्य नहीं है; क्योंकि इतना प्रतिग्रह कोई कहाँसे कर सकता है ? ॥ ६ ॥