बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Brihadaranyaka Upanishad with Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
DevanagariSanskritpublished1,402 पृष्ठ
पृष्ठ 1249, कुल 1402 में से
संदर्भ में पढ़ेंपृष्ठ 1249
ब्राह्मण १४ ] शाङ्करभाष्यार्थ १२३५
| स य इमांस्त्रीन् स यो गायत्रीविदिमान् भूरादींस्त्रीन् गोऽश्वादिधनपूर्णॉल्लोकान् प्रतिगृह्णीयात् स प्रतिग्रहोऽस्या गायत्र्या एतत् प्रथमं पदं यद् व्याख्यातमाप्नुयात् । प्रथमपदविज्ञानफलं तेन भुक्तं स्यान्न त्वधिकदोषोत्पादकः स प्रतिग्रहः । | 'स य इमांस्त्रीन्' जो गायत्र्युपासक इन गो-अश्वादि धनसे पूर्ण भूर्लोकादि तीन लोकोंका प्रतिग्रह (दान) स्वीकार करता है, वह प्रतिग्रह इस गायत्रीके इस प्रथम पादको, जिसकी कि व्याख्या की गयी है, व्याप्त करता है। अर्थात् उसके द्वारा केवल प्रथम पादके विज्ञानका फल भोगा जाता है, वह प्रतिग्रह इससे अधिक दोष उत्पन्न करनेवाला नहीं है। |
| अथ पुनर्यावतीयं त्रयीविद्या, यस्तावत् प्रतिगृह्णीयात् सोऽस्या एतद् द्वितीयं पदमाप्नुयात् । द्वितीयपदविज्ञानफलं तेन भुक्तं स्यात् । तथा यावदिदं प्राणि यस्तावत् प्रतिगृह्णीयात् सोऽस्या एतत् तृतीयं पदमाप्नुयात् । तेन तृतीयपदविज्ञानफलं भुक्तं स्यात् । | और फिर जितनी भी यह त्रयीविद्या है, उतना जो प्रतिग्रह करता है, उसका वह प्रतिग्रह इसके इस द्वितीय पादको ही व्याप्त करता है। उसके द्वारा द्वितीय पादके विज्ञानका फल ही भोगा जाता है। तथा जितने ये प्राणी हैं, जो उतना प्रतिग्रह करता है, वह प्रतिग्रह इसके तृतीय पादको ही व्याप्त करता है। उसके द्वारा तृतीय पादके विज्ञानका फल ही भोगा जाता है। |
| कल्पयित्वेदमुच्यते। पादत्रयसममपि यदि कश्चित् प्रतिगृह्णीयात् तत् पादत्रयविज्ञानफलस्यैव क्षयकारणं न त्वन्यस्य दोषस्य कर्तृत्वे क्षमम् । न चैवं दाता | यह बात कल्पना करके कही गयी है अर्थात् यदि कोई गायत्रीके पादत्रयके समान भी प्रतिग्रह करे तो उसका वह प्रतिग्रह पादत्रयविज्ञानके फलमात्रका क्षय करनेका कारण हो सकता है, वह कोई और दोष करनेमें समर्थ नहीं है। ऐसे दाता ओर |