भारतकोश
बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

Brihadaranyaka Upanishad with Shankara Bhashya

आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished1,402 पृष्ठ

पृष्ठ 1250, कुल 1402 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 1250
१२३६बृहदारण्यकोपनिषद्[ अध्याय ५

| प्रतिग्रहीता वा गायत्रीविज्ञानस्तुतये कल्प्यते, दाता प्रतिग्रहीता च यद्यप्येवं सम्भाव्यते नासौ प्रतिग्रहोऽपराधक्षमः, कस्मात् ? यतोऽभ्यधिकमपि पुरुषार्थविज्ञानमवशिष्टमेव चतुर्थपादविषयं गायत्र्यास्तद्दर्शयति—<br><br>अथास्या एतदेव तुरीयं दर्शतं पदं परोरजा य एष तपति ।<br><br>यच्चैतन्नैव केनचन केनचिदपि प्रतिग्रहेणाप्यं नैव प्राप्यमित्यर्थः, यथा पूर्वोक्तानि त्रीणि पदानि । एतान्यपि नैवाप्यानि केनचित् कल्पयित्वैवमुक्तं परमार्थतः कुत उ एतावत् प्रतिगृह्णीयात् त्रैलोक्यादिसमम् । तस्माद् गायत्र्येवंप्रकारोपास्येत्यर्थः ॥ ६ ॥ | प्रतिग्रहीताकी केवल गायत्र्युपासनाकी स्तुतिके लिये ही कल्पना की गयी हो—ऐसी बात नहीं है; यद्यपि ऐसा दाता और प्रतिग्रह करनेवाला सम्भव हो सकता है, किंतु यह प्रतिग्रह कोई अपराध (दोष) करनेमें समर्थ नहीं है, क्यों ? क्योंकि गायत्रीके चतुर्थ पादका विषयभूत इससे भी अधिक पुरुषार्थविज्ञान अभी अवशिष्ट है ही। उसे श्रुति दिखलाती है—<br><br>और यह जो तपता है यही इसका तुरीय अर्थात् चौथा दर्शत परोरजा पद है। और यह जो है, किसी भी प्रतिग्रहके द्वारा आप्य अर्थात् प्राप्तव्य नहीं है, जिस प्रकार कि पूर्वोक्त तीन पद हैं। वास्तवमें तो ये भी किसीसे आप्य नहीं हैं, कल्पना करके ही ऐसा कहा है। वास्तवमें त्रैलोक्यादिके समान इतना कोई कहाँसे प्रतिग्रह करेगा ? अतः तात्पर्य यही है कि इस प्रकारकी गायत्रीकी ही उपासना करनी चाहिये ॥ ६ ॥ |


गायत्रीका उपस्थान और उसका फल

तस्या उपस्थानं गायत्र्यस्येकपदी द्विपदी त्रिपदी चतुष्पद्यपद्सि न हि पद्यसे । नमस्ते तुरीयाय दर्शताय पदाय परोरजसेऽसावदो मा प्रापदिति यं द्विष्यादसावस्मै