भारतकोश
बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

Brihadaranyaka Upanishad with Shankara Bhashya

आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished1,402 पृष्ठ

पृष्ठ 1262, कुल 1402 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 1262
१२४८बृहदारण्यकोपनिषद्[अध्याय ६

ज्येष्ठ-श्रेष्ठ-दृष्टिसे प्राणोपासना

ॐ यो ह वै ज्येष्ठं च श्रेष्ठं च वेद ज्येष्ठश्च श्रेष्ठश्च स्वानां भवति प्राणो वै ज्येष्ठश्च श्रेष्ठश्च ज्येष्ठश्च श्रेष्ठश्च स्वानां भवत्यपि च येषां बुभूषति य एवं वेद ॥ १ ॥

जो कोई ज्येष्ठ और श्रेष्ठको जानता है, वह अपने ज्ञातिजनोंमें ज्येष्ठ और श्रेष्ठ होता है। प्राण ही ज्येष्ठ और श्रेष्ठ है। जो इस प्रकार उपासना करता है, वह अपने ज्ञातिजनोंमें तथा और भी जिन लोगोंमें चाहता है, उनमें भी ज्येष्ठ और श्रेष्ठ होता है ॥ १ ॥

संस्कृत-भाष्यहिन्दी-अनुवाद
यः कश्चिद्ध वा इत्यवधारणार्थौ। यो ज्येष्ठश्रेष्ठगुणं वक्ष्यमाणं यो वेदासौ भवत्येव ज्येष्ठश्च श्रेष्ठश्च। एवं फलेन प्रलोभितः सन् प्रश्नायाभिमुखीभूतस्तस्मै चाह—'प्राणो वै ज्येष्ठश्च श्रेष्ठश्च ।<br><br>कथं पुनरवगम्यते प्राणो ज्येष्ठश्च श्रेष्ठश्चेति ? यस्मान्निषेककाल एव शुक्रशोणितसम्बन्धः प्राणादिकलापस्याविशिष्टः; तथापि नाप्राणं शुक्रं विरोहतीति प्रथमो वृत्तिलाभः प्राणस्य चक्षुरादिभ्यः अतो ज्येष्ठो वयसा प्राणः।जो कोई; यहाँ 'ह' और 'वै' निश्चयार्थक हैं, जो आगे बतलाये जानेवाले ज्येष्ठ और श्रेष्ठ गुणवाले प्राणको जानता है, वह ज्येष्ठ और श्रेष्ठ हो ही जाता है। इस प्रकार फलसे प्रलोभित होनेपर जब साधक प्रश्नके लिये अभिमुख होता है तो उससे श्रुति कहती है—'प्राण ही ज्येष्ठ और श्रेष्ठ है।'<br><br>किंतु यह जाना कैसे जाता है कि प्राण ज्येष्ठ और श्रेष्ठ है। क्योंकि गर्भाधानके समय ही यद्यपि प्राणादिसमूहका शुक्र और शोणितसे समान सम्बन्ध है, तो भी बिना प्राणके शुक्रमें शरीरका अङ्कुर नहीं होता; अतः चक्षु आदि इन्द्रियोंकी अपेक्षा प्राणको पहले वृत्तिलाभ होता है; इसलिये आयुके द्वारा प्राण ज्येष्ठ है।