बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Brihadaranyaka Upanishad with Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 1267, कुल 1402 में से
संदर्भ में पढ़ें| ब्राह्मण १ ] | शाङ्करभाष्यार्थ | १२५३ |
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| पुनः श्रोत्रस्य संपद्गुणत्वम् ? इत्युच्यते। श्रोत्रे सति हि यस्मात् सर्वे वेदा अभिसंपन्नाः श्रोत्रेेन्द्रियवतोऽध्येयत्वात्। वेदविहितकर्मायत्ताश्च कामास्तस्माच्छ्रोत्रं संपत् अतो विज्ञानानुरूपं फलम्; सं हास्मै पद्यते यं कामं कामयते य एवं वेद ॥ ४ ॥ | सम्पद है। किंतु श्रोत्रका सम्पद्गुणत्व किस प्रकार है? सो बतलाया जाता है। श्रोत्रके रहते ही सम्पूर्ण वेद सब प्रकार निष्पन्न होते हैं, क्योंकि वे श्रोत्रेन्द्रियवान्द्वारा हो अध्ययन किये जा सकते हैं और भोग तो वेदविहित कर्मोंके ही अधीन हैं, इसलिये श्रोत्र सम्पद् है। अतः विज्ञान (उपासना) के अनुरूप ही फल मिलता है। जो ऐसी उपासना करता है, वह जिस भोगकी इच्छा करता है, वही उसे मिल जाता है।४। |
आयतनदृष्टिसे मनकी उपासना
यो ह वा आयतनं वेदायतन ँस्वानां भवत्यायतनं जनानां मनो वा आयतनमायतनँ स्वानां भवत्यायतनं जनानां य एवं वेद ॥ ५ ॥
जो आयतनको जानता है, वह स्वजनोंका आयतन होता है तथा अन्य जनोंका भी आयतन होता है। मन ही आयतन है जो इस प्रकार उपासना करता है; वह स्वजनोंका आयतन होता है तथा अन्य जनोंका भी आयतन होता है ॥ ५ ॥
| यो ह वा आयतनं वेद-आयतनमाश्रयस्तदू यो वेदायतनंस्वानां भवत्यायतनं जनानामन्येषामपि। किं पुनस्तदायतनम् इत्युच्यते-मनोवा आयतनमाश्रय इन्द्रियाणां | जो भी आयतनको जानता है-आयतन आश्रयको कहते हैं, उसे जो कोई जानता है, वह स्वजनोंका आयतन होता है तथा अन्य जनोंका भी आयतन होता है। अच्छा तो वह आयतन क्या है? इसपर कहा जाता है-मन ही आयतन अर्थात् इन्द्रिय |