बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Brihadaranyaka Upanishad with Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 1278, कुल 1402 में से
संदर्भ में पढ़ें| १२६४ | बृहदारण्यकोपनिषद् | [ अध्याय ६ |
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| केचित्तु सर्वभक्षणे दोषाभावं वदन्ति प्राणान्नविदः; तदसत्; शास्त्रान्तरेण प्रतिषिद्धत्वात्। तेनास्य विकल्प इति चेत्? न; अविधायकत्वात्; न ह वा अस्यानन्नं जग्धं भवतीति सर्वं प्राणस्यान्नमित्येतस्य विज्ञानस्य विहितस्य स्तुत्यर्थमेतत्; तेनैकवाक्यतापत्तेः। न तु शास्त्रान्तरविहितस्य बाधने सामर्थ्यमन्यपरत्वादस्य; प्राणमात्रस्य सर्वमन्नमित्येतद्दर्शनमिह विधित्सितं न तु सर्वं भक्षयेदिति। | कोई-कोई तो कहते हैं कि प्राणोपासकको सर्वभक्षणमें दोष नहीं है, किंतु यह ठीक नहीं है; क्योंकि अन्य शास्त्र इसका निषेध करते हैं। यदि उन शास्त्रोंसे इसका विकल्प माना जाय तो यह भी ठीक नहीं; क्योंकि यह वाक्य विधान करनेवाला नहीं है; 'इसके द्वारा अभक्ष्य भक्षण नही किया जाता' यह आगेका वाक्य 'सब प्राणका ही अन्न है' इस प्रकार विधान किये गये विज्ञानकी स्तुतिके लिये है; क्योंकि उसके साथ इसकी एकवाक्यता सम्भव है। शास्त्रान्तरद्वारा विहित अर्थका बाध करनेमें इसकी सामर्थ्य नहीं है, क्योंकि यह वाक्य अन्यपरक है। यहाँ तो इसी दृष्टिका विधान करना अभीष्ट है कि सब अन्न अकेले प्राणका ही है, यह बतलाना अपेक्षित नहीं कि सब कुछ खा ले। | | यत्तु सर्वभक्षणे दोषाभावज्ञानं तन्मिथ्यैव प्रमाणाभावात्। | जो ऐसा कहते हैं, कि इससे सर्वभक्षणमें दोषाभावका ज्ञान होता है; उनका वह कथन कोई प्रमाण न होनेके कारण मिथ्या ही है। | | विदुषः प्राणत्वात् सर्वान्नोपपत्तेः सामर्थ्याददोष एवेति चेत्? न; | यदि कोई कहे कि प्राणरूप होनेके कारण प्राणोपासकका सभी अन्न हो सकता है, सामर्थ्य होनेके कारण इसमें कोई दोष है ही नहीं, तो यह ठीक नहीं, क्योंकि |