भारतकोश
बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

Brihadaranyaka Upanishad with Shankara Bhashya

आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished1,402 पृष्ठ

पृष्ठ 1286, कुल 1402 में से

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पृष्ठ 1286
१२७२बृहदारण्यकोपनिषद्[ अध्याय ६

| अपि चैतावदमृतत्वमित्युक्तं न कर्मणोऽमृतत्वाशास्तीति च; तत्र हेतुर्नोक्तस्तदर्थश्चायमारम्भः। यस्मादियं कर्मणो गतिर्न नित्येऽमृतत्वे व्यापारोऽस्ति तस्मादेतावदेवामृतत्वसाधनम्—इति सामर्थ्याद्धेतुत्वं संपद्यते । <br><br> अपि चोक्तमग्निहोत्रे नत्वेवैतद्योत्स्वमुत्क्रान्तिं न गतिं न प्रतिष्ठां न तृप्तिं न पुनरावृत्तिं न लोकं प्रत्युत्थायिनं वेत्थेति । तत्र प्रतिवचने ‘ते वा एते आहुती हुते उत्क्रामतः' इत्यादिनाहुतेः कार्यमुक्तम्। तच्चैतत् कर्तुराहुति- | इसके सिवा 'अमृतत्व इतना ही है' यह भी कहा गया है तथा यह भी बताया है कि 'कर्मसे अमृतत्वकी आशा नहीं है।' किंतु इसमें हेतु नहीं बताया गया, उसे बतानेके लिये भी यह आरम्भ किया गया है !¹ क्योंकि यह कर्मकी गति है और नित्य अमृतत्वमें कोई भी व्यापार है नहीं, इसलिये इतना ही अमृतत्वका साधन है—इस वचनके सामर्थ्यसे यह उसका हेतु हो जाता है !² <br><br> इसके सिवा अग्निहोत्रके प्रकरणमें ऐसा कहा गया है—तू इन सायंकालिक, प्रातःकालिक अग्निहोत्रकी दोनों आहुतियोंकी न उत्क्रान्तिको जानता है, न गतिको, न प्रतिष्ठाको, न तृप्तिको, न पुनरावृत्तिको और न लोकके प्रति उत्थान करनेवाले यजमानको ही जानता है। वहा उत्तरमें 'वे ये दोनों आहुतियाँ हवन की जानेपर उत्क्रमण करती हैं' इत्यादि वाक्यसे आहुतिका कार्य बताया गया है। यह भी कर्ताके |


१. आगे बतलायी जानेवाली तो कर्मकी गति है, मोक्षका साधन तो केवल ज्ञान ही है। ऐसी स्थितिमें आगेका ग्रन्थ मोक्षका हेतु बतलानेमें किस प्रकार उपयोगी हो सकता है, सो अगले वाक्यसे बतलाया जाता है।
२. ज्ञानातिरिक्त उपाय संसारका ही कारण है—इस नियमरूप सामर्थ्यसे ज्ञान ही मोक्षका उपाय है' यह सिद्ध होता है।