बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Brihadaranyaka Upanishad with Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 1294, कुल 1402 में से
संदर्भ में पढ़ें| १२७८ | बृहदारण्यकोपनिषद् | [अध्याय ६ |
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| यद्येवं वेत्थ उ देवयानस्य पथो मार्गस्य प्रतिपदं प्रतिपद्यते येन सा प्रतिपत्, तां प्रतिपदं पितृयाणस्य वा प्रतिपदं प्रतिपच्छब्दवाच्यमर्थमाह—यत् कर्म कृत्वा यथाविशिष्टं कर्म कृत्वेत्यर्थः; देवयानं वा पन्थानं मार्गं प्रतिपद्यन्ते पितृयाणं वा यत् कर्म कृत्वा प्रतिपद्यन्ते तत् कर्म प्रतिपदुच्यते तां प्रतिपदं किं वेत्थ देवलोकपितृलोकप्रतिपत्तिसाधनं किं वेत्थेत्यर्थः । <br><br> अप्यत्रास्यार्थस्य प्रकाशकमृषेर्मन्त्रस्य वचो वाक्यं नः श्रुतमस्ति। मन्त्रोऽप्यस्यार्थस्य प्रकाशको विद्यत इत्यर्थः । कोऽसौ मन्त्रः ? इत्युच्यते—द्वे सृती द्वौ मार्गौवशृणवं श्रुतवानस्मि, तयोरेका पितॄणां प्रापिका पितृलोकसंबद्धा तया सृत्या पितृलोकं प्राप्नोतीत्यर्थः । अहमशृणवमिति व्यवहितेन संबन्धः । देवानाम्रुतापि देवानां संबन्धिन्यन्या देवान् प्रापयति सा । के पुनरुभाभ्यां | ‘यदि ऐसी बात है, तो क्या तू देवयानमार्गके प्रतिपद्—जिसके द्वारा पुरुष प्रतिपन्न होते (गमन करते) हैं, उसे प्रतिपद् कहते हैं, उस प्रतिपद्को तथा पितृयानके प्रतिपद्को जानता है?’ श्रुति ‘प्रतिपद्’ शब्दका अर्थ बतलाती है—जो कर्म करके अर्थात् यथाविशिष्ट कर्म करके देवयान या पितृयानमार्गको प्राप्त होते हैं, वह कर्म ‘प्रतिपद्’ कहलाता है, ‘उस प्रतिपद्को क्या तू जानता है? अर्थात् क्या तुझे देवलोक और पितृलोककी प्राप्तिके साधनका ज्ञान है?’ <br><br> ‘हमने इस अर्थके प्रकाशक ऋषि अर्थात् मन्त्रका वाक्य भी सुना है। अर्थात् इस अर्थका प्रकाशक मन्त्र भी विद्यमान है। वह मन्त्र कौन-सा है सो बतलाया जाता है—मैंने दो मार्ग सुने हैं; उनमें एक पितृगणकी प्राप्ति करानेवाला अर्थात् पितृलोकसे सम्बद्ध है, तात्पर्य यह है कि उस मार्गसे पुरुष पितृलोकको प्राप्त करता है।’ मूलमें ‘अहम् अशृणवम्’ इस प्रकार व्यवहित पदोंका सम्बन्ध है। ‘और दूसरा मार्ग देवताओंका यानी देवताओंसे सम्बद्ध है अर्थात् जो देवताओंको प्राप्त कराता है,वह है।’ |